श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.27.15 
मन्यमानस्तदात्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा ।
नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुर: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जीवात्मा स्वयं को स्पष्ट रूप से एक द्रष्टा के रूप में देख सकता है, लेकिन गहरी निद्रा के दौरान अहंकार के लुप्त हो जाने पर वह ठीक उसी तरह अपने को खोया हुआ समझने लगता है जैसे कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति खो देने पर खोया-खोया महसूस करता है।
 
The soul can clearly experience its existence as a seer, but during deep sleep, because the ego goes away, it considers itself destroyed, just as a man considers himself destroyed when his property is destroyed.
तात्पर्य

केवल अज्ञानता में ही कोई जीव अपने को भ्रष्ट मानता है। यदि ज्ञान की प्राप्ति से वह अपने शाश्वत अस्तित्व की सही स्थिति में आ जाए तो जानता है कि वह भ्रष्ट नहीं हुआ है। यहाँ एक उपयुक्त उदाहरण का उल्लेख किया गया है: नष्ट-वित्त इवातुरः। एक व्यक्ति जिसने एक बड़ी धनराशि खो दी है, वह सोच सकता है कि वह भ्रष्ट हो गया है, लेकिन वास्तव में वह नहीं खोया है - केवल उसका धन ही खो गया है। लेकिन धन में उसकी तल्लीनता या धन के साथ उसकी पहचान के कारण, वह सोचता है कि वह भ्रष्ट हो गया है। इसी तरह, जब हम अपने गतिविधियों के क्षेत्र के रूप में भौतिक पदार्थ के साथ गलत पहचान करते हैं, तो हम सोचते हैं कि हम भ्रष्ट हो गए हैं, हालाँकि वास्तव में हम नहीं हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति शुद्ध ज्ञान को समझने के लिए जागृत होता है कि वह भगवान का एक शाश्वत सेवक है, उसकी अपनी वास्तविक स्थिति फिर से प्रकट होती है। एक जीव कभी भी भ्रष्ट नहीं हो सकता। जब कोई गहरी नींद में अपनी पहचान भूल जाता है, तो वह सपनों में लीन हो जाता है, और वह खुद को एक अलग व्यक्ति समझ सकता है या खुद को भ्रष्ट मान सकता है। लेकिन वास्तव में उसकी पहचान बरकरार है। भ्रष्ट होने की यह अवधारणा मिथ्या अहंकार के कारण है, और यह तब तक जारी रहता है जब तक कि व्यक्ति को भगवान के एक शाश्वत सेवक के रूप में अपने अस्तित्व की भावना के लिए नहीं जगाया जाता है। मायवादी दार्शनिकों की सर्वोच्च प्रभु के साथ एक बनने की अवधारणा मिथ्या अहंकार में भ्रष्ट होने का एक और लक्षण है। कोई झूठे तौर पर दावा कर सकता है कि वह सर्वोच्च प्रभु है, लेकिन वास्तव में वह नहीं है। यह जीव पर माया के प्रभाव का अंतिम जाल है। खुद को सर्वोच्च प्रभु के बराबर समझना या खुद को सर्वोच्च प्रभु मानना भी मिथ्या अहंकार के कारण होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)