श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 27: प्रकृति का ज्ञान  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.27.13 
एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोमयै: ।
स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यद‍ृक् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार स्वयं को साकार करने वाली आत्मा सबसे पहले त्रिविध अहंकार में प्रतिबिंबित होती है और फिर शरीर, इंद्रियों और मन में।
 
Thus, the self-realized soul is first reflected in the threefold ego and then in the body, senses and mind.
तात्पर्य
शर्तबद्ध आत्मा सोचती है, "मैं यह शरीर ही हूँ," जबकि एक मुक्त आत्मा सोचती है, "मैं यह शरीर नहीं हूँ। मैं आत्मा हूँ।" इस "मैं" को अहंकार या आत्म की पहचान कहा जाता है। "मैं यह शरीर हूँ" या "शरीर के संबंध में सब कुछ मेरा है" को मिथ्या अहंकार कहा जाता है, लेकिन जब व्यक्ति आत्म-साक्षात्कारी होता है और सोचता है कि वह परम प्रभु का एक शाश्वत सेवक है, तो वह पहचान वास्तविक अहंकार है। एक अवधारणा भौतिक प्रकृति के त्रिगुणात्मक गुणों - सत्व, रज और तम - के अंधकार में है और दूसरा सत्व के शुद्ध अवस्था में है, जिसे शुद्ध-सत्व या वासुदेव कहा जाता है। जब हम कहते हैं कि हम अपना अहंकार छोड़ देते हैं, तो इसका मतलब है कि हम अपने मिथ्या अहंकार को छोड़ देते हैं, लेकिन वास्तविक अहंकार हमेशा मौजूद रहता है। जब कोई मिथ्या पहचान में शरीर और मन के भौतिक संदूषण से प्रतिबिंबित होता है, तो वह शर्तबद्ध स्थिति में होता है, लेकिन जब वह शुद्ध अवस्था में प्रतिबिंबित होता है तो उसे मुक्त कहा जाता है। शर्तबद्ध अवस्था में अपनी भौतिक संपत्ति के साथ अपनी पहचान को शुद्ध किया जाना चाहिए, और व्यक्ति को स्वयं की पहचान परम प्रभु के साथ संबंध में करनी चाहिए। शर्तबद्ध अवस्था में व्यक्ति सभी चीजों को इंद्रिय तृप्ति की वस्तु के रूप में स्वीकार करता है, और मुक्त अवस्था में व्यक्ति सभी चीजों को परम प्रभु की सेवा के लिए स्वीकार करता है। कृष्ण चेतना, भक्ति सेवा, एक जीवित इकाई की वास्तविक मुक्त अवस्था है। अन्यथा, भौतिक मंच पर या शून्यता या अवैयक्तिकता में स्वीकार और अस्वीकार दोनों ही शुद्ध आत्मा के लिए अपूर्ण स्थितियाँ हैं। सत्य-दृष्टि नामक शुद्ध आत्मा की समझ से, कोई भी सब कुछ को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रतिबिंब के रूप में देख सकता है। इस संबंध में एक ठोस उदाहरण दिया जा सकता है। एक शर्तबद्ध आत्मा एक बहुत ही सुंदर गुलाब देखती है, और वह सोचती है कि सुंदर सुगंधित फूल का उपयोग उसकी अपनी इंद्रिय तृप्ति के लिए किया जाना चाहिए। यह एक प्रकार की दृष्टि है। हालाँकि, एक मुक्त आत्मा उसी फूल को भगवान के सर्वोच्च के प्रतिबिंब के रूप में देखती है। वह सोचता है, "यह सुंदर फूल भगवान के सर्वोच्च की श्रेष्ठ ऊर्जा द्वारा संभव हुआ है; इसलिए यह भगवान के सर्वोच्च का है और उसकी सेवा में इसका उपयोग किया जाना चाहिए।" ये दो प्रकार की दृष्टियाँ हैं। शर्तबद्ध आत्मा अपने स्वयं के आनंद के लिए फूल को देखती है, और भक्त फूल को प्रभु की सेवा में उपयोग की जाने वाली वस्तु के रूप में देखता है। उसी तरह, व्यक्ति स्वयं की इंद्रियों, मन और शरीर में - हर चीज में भगवान के सर्वोच्च के प्रतिबिंब को देख सकता है। उस सही दृष्टि से, व्यक्ति सब कुछ को प्रभु की सेवा में लगा सकता है। भक्ति-रसामृत-सिंधु में कहा गया है कि जिसने सब कुछ लगाया है - अपनी महत्वपूर्ण ऊर्जा, अपनी संपत्ति, अपनी बुद्धि और अपने शब्दों को प्रभु की सेवा में, या जो इन सभी को प्रभु की सेवा में लगाने की इच्छा रखता है, चाहे वह कैसे भी स्थित हो, उसे मुक्त आत्मा या सत्य-दृष्टि माना जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति ने चीजों को वैसे ही समझ लिया है जैसे वे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)