अविकार का अर्थ है "बिना परिवर्तन"। भगवद गीता में यह पुष्टि की गई है कि प्रत्येक जीवित इकाई सर्वोच्च भगवान का एक अभिन्न अंग है, और इस प्रकार उसकी शाश्वत स्थिति सर्वोच्च भगवान के साथ उसकी ऊर्जा का समन्वय या समन्वय करना है। यही उसका अपरिवर्तनीय स्थान है। जैसे ही वह अपनी ऊर्जा और गतिविधियों को इंद्रिय सुख के लिए नियोजित करता है, स्थिति का यह परिवर्तन विकार कहलाता है। इसी तरह, इस भौतिक शरीर में भी, जब वह आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में भक्ति सेवा का अभ्यास करता है, तो वह ऐसी स्थिति में आ जाता है जो बिना किसी परिवर्तन के होती है क्योंकि यह उसका स्वाभाविक कर्तव्य है। जैसा कि श्रीमद-भागवत में कहा गया है, मुक्ति का अर्थ अपनी मूल स्थिति में पुनः स्थापना है। मूल स्थिति भगवान की सेवा करने (भक्ति-योगेन, भक्त्या) में से एक है। जब कोई भौतिक आकर्षण से अलग हो जाता है और पूरी तरह से भक्ति सेवा में संलग्न हो जाता है, तो वह अपरिवर्तनशीलता है। अकर्त्रत्व का अर्थ है इंद्रिय सुख के लिए कुछ भी न करना। जब कोई अपने जोखिम पर कुछ करता है, तो स्वामित्व की भावना होती है और इसलिए एक प्रतिक्रिया होती है, लेकिन जब कोई सब कुछ कृष्ण के लिए करता है, तो गतिविधियों पर कोई स्वामित्व नहीं होता है। अपरिवर्तनशीलता और गतिविधियों के स्वामित्व का दावा नहीं करने से, कोई तुरंत उस पारलौकिक स्थिति में खुद को स्थित कर सकता है जिसमें कोई भौतिक प्रकृति के गुणों से अछूता नहीं है, जैसे पानी से सूर्य का प्रतिबिंब अप्रभावित होता है।
