वैदिक साहित्यों में कहा गया है कि परम भगवान की निगाह से कुल भौतिक ऊर्जा गर्भवती होती है, और फिर सब कुछ भौतिक प्रकृति से पैदा होता है। भगवद्-गीता के नौवें अध्याय में भी यह पुष्टि की गई है कि उनकी निगाह के तहत, अध्याक्षेण - उनके निर्देशन और उनकी इच्छा से - प्रकृति काम कर रही है। ऐसा नहीं है कि प्रकृति नेत्रहीन होकर काम करती है। भौतिक प्रकृति के संबंध में सशर्त आत्माओं की स्थिति को समझने के बाद, देवहूति जानना चाहती थी कि प्रकृति कैसे भगवान के निर्देशन में काम करती है और भौतिक प्रकृति और भगवान के बीच क्या संबंध है। दूसरे शब्दों में, वह भौतिक प्रकृति के संबंध में सर्वोच्च भगवान के गुणों को सीखना चाहती थीं।
मायावादी इसे उस तरह से व्याख्या कर सकते हैं, हालाँकि, पदार्थ के साथ जीवित प्राणियों का संबंध और पदार्थ के साथ सर्वोच्च भगवान का संबंध निश्चित रूप से एक ही स्तर पर नहीं है। जब यह कहा जाता है कि जीवित प्राणी भ्रमित होते हैं, तो मायावादी दार्शनिक इस भ्रम को परम भगवान के लिए जिम्मेदार मानते हैं। पर ऐसा नहीं है। भगवान कभी भ्रमित नहीं होते। यही व्यक्तिवादियों और अवैयक्तिकवादियों के बीच का अंतर है। देवहूति मूर्ख नहीं हैं। उनके पास यह समझने की पर्याप्त बुद्धि है कि जीवित प्राणी परमेश्वर के स्तर पर नहीं हैं। क्योंकि जीवित प्राणी असीम हैं, वे भौतिक प्रकृति से भ्रमित या वातानुकूलित हो जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि परम प्रभु भी वातानुकूलित या भ्रमित हैं। सशर्त आत्मा और भगवान के बीच का अंतर यह है कि प्रभु भगवान हैं, भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं, और इसलिए वे इसके नियंत्रण के अधीन नहीं हैं। वह न तो आध्यात्मिक प्रकृति से नियंत्रित होता है न ही भौतिक प्रकृति से। वह स्वयं सर्वोच्च नियंत्रक हैं, और उनकी तुलना सामान्य जीवित प्राणियों से नहीं की जा सकती, जो भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा नियंत्रित होते हैं।
इस श्लोक में प्रयुक्त दो शब्द हैं सत और असत। ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति असत है - यह अस्तित्व में नहीं है - लेकिन परम भगवान की भौतिक ऊर्जा सत है, या हमेशा अस्तित्वशील है। भौतिक प्रकृति हमेशा भगवान की ऊर्जा के रूप में अपने सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहती है, पर कभी-कभी इस अस्तित्वहीन या अस्थायी अस्तित्व वाली प्रकृति, ब्रह्मांड को प्रकट करती है। पिता और माता के साथ समानता बनाई जा सकती है: माता और पिता मौजूद हैं, पर कभी-कभी माता बच्चों को जन्म देती है। उसी प्रकार, सर्वोच्च भगवान की अप्रकट भौतिक प्रकृति से आई यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति कभी प्रकट होती है तो कभी गायब हो जाती है। पर भौतिक प्रकृति हमेशा विद्यमान रहती है, और इस भौतिक दुनिया के सूक्ष्म और स्थूल दोनों अभिव्यक्तियों का भगवान सर्वोच्च कारण हैं।
