श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.26.72 
तमस्मिन्प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया ।
भक्त्या विरक्त्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत् ॥ ७२ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए, एकाग्र भक्ति के माध्यम से प्राप्त समर्पण, वैराग्य और आध्यात्मिक ज्ञान में प्रगति के माध्यम से, व्यक्ति को इस शरीर में परमात्मा को विद्यमान समझकर उसका विचार करना चाहिए, यद्यपि वे इससे पृथक रहते हैं।
 
Therefore, by progressing in spiritual knowledge through surrender, detachment and concentrated devotion, one must contemplate on the Supreme Being present in this very body, though He is separate from it.
तात्पर्य
मानव अपने भीतर के परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। वह मनुष्य के शरीर में है परंतु शरीर से अलग है, या शरीर से परे है। व्यक्‍तिगत आत्मा के समान शरीर में होने पर भी, परमात्मा को शरीर से कोई लगाव नहीं है, जबकि वैयक्तिक आत्मा को ज़रूर है। इसलिए मनुष्य को भक्‍ति सेवा के माध्यम से अपने आपको इस भौतिक शरीर से अलग करना होगा। यहाँ साफ तौर पर कहा गया है (भक्‍त्या) कि मनुष्य को परम के लिए भक्‍ति सेवा करनी होगी। जैसे कि श्रीमद भागवतम् (1.2.7) के पहले कांड, द्वितीय अध्‍याय में कहा गया है: वासुदेवे भगवति भक्ति-योगः प्रयोज़िताः। जब सम्‍पूर्ण पवित्र भक्‍तिभाव से सर्वव्‍यापी विष्‍णु, भगवान का परम पुरुषोत्‍तम रूप वासुदेव की सेवा की जाती है, तो भौतिक दुनिया से तुरंत वैराग्‍य की शुरुआत होती है। सांख्य का उद्देश्‍य भौतिक संदूषण से अपने आपको अलग करना है। यह केवल भगवान के परम पुरुषोत्‍तम रूप के प्रति भक्‍तिभाव द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

जब मनुष्य भौतिक समृद्धि के आकर्षण से मुक्‍त हो जाता है, तो वह वास्‍तव में अपने मन को परमात्मा में केन्‍द्रित कर सकता है। जब तक मन भौतिक की ओर विचलित है, भगवान के परम पुरुषोत्‍तम रूप या उनके आंशिक प्रतिनिधित्‍व परमात्‍मा पर अपने मन और बुद्धि को केन्‍द्रित करने की कोई संभावना नहीं है। दूसरे शब्‍दों में, कोई अपने मन और ऊर्जा को तब तक परम पर केंद्रित नहीं कर सकता जब तक कि वह भौतिक दुनिया से अलग नहीं हो जाता। भौतिक दुनिया से वैराग्‍य के बाद ही, मनुष्य वास्‍तव में पूर्ण सत्य का आध्‍यात्मिक ज्ञान प्राप्‍त कर सकता है। जब तक मनुष्य इंद्रिय सुख या भौतिक सुख में उलझा रहता है, तब तक पूर्ण सत्य को समझना संभव नहीं है। इसकी पुष्टि भगवद गीता (18.54) में भी की गई है। मनुष्‍य जो भौतिक संदूषण से मुक्‍त होता है, वह आनंदित होता है और भक्ति सेवा में प्रवेश कर सकता है, और भक्ति सेवा से वह मुक्‍त हो सकता है।

श्रीमद भागवतम, प्रथम कांड में, यह कहा गया है कि भक्ति सेवा करने से मनुष्य आनंदित होता है। उस आनंदकारी स्थिति में, मनुष्‍य भगवान के विज्ञान या कृष्र्ण भावना को समझ सकता है; वरना यह संभव नहीं है। भौतिक प्रकृति के तत्‍वों का विश्लेषणात्‍मक अध्‍ययन और परमात्‍मा पर मन की एकाग्रता सांख्य दार्शनिक प्रणाली का सार है। इस सांख्य-योग की पूर्णता परम सत्य के लिए भक्ति सेवा में होती है।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)