जब मनुष्य भौतिक समृद्धि के आकर्षण से मुक्त हो जाता है, तो वह वास्तव में अपने मन को परमात्मा में केन्द्रित कर सकता है। जब तक मन भौतिक की ओर विचलित है, भगवान के परम पुरुषोत्तम रूप या उनके आंशिक प्रतिनिधित्व परमात्मा पर अपने मन और बुद्धि को केन्द्रित करने की कोई संभावना नहीं है। दूसरे शब्दों में, कोई अपने मन और ऊर्जा को तब तक परम पर केंद्रित नहीं कर सकता जब तक कि वह भौतिक दुनिया से अलग नहीं हो जाता। भौतिक दुनिया से वैराग्य के बाद ही, मनुष्य वास्तव में पूर्ण सत्य का आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है। जब तक मनुष्य इंद्रिय सुख या भौतिक सुख में उलझा रहता है, तब तक पूर्ण सत्य को समझना संभव नहीं है। इसकी पुष्टि भगवद गीता (18.54) में भी की गई है। मनुष्य जो भौतिक संदूषण से मुक्त होता है, वह आनंदित होता है और भक्ति सेवा में प्रवेश कर सकता है, और भक्ति सेवा से वह मुक्त हो सकता है।
श्रीमद भागवतम, प्रथम कांड में, यह कहा गया है कि भक्ति सेवा करने से मनुष्य आनंदित होता है। उस आनंदकारी स्थिति में, मनुष्य भगवान के विज्ञान या कृष्र्ण भावना को समझ सकता है; वरना यह संभव नहीं है। भौतिक प्रकृति के तत्वों का विश्लेषणात्मक अध्ययन और परमात्मा पर मन की एकाग्रता सांख्य दार्शनिक प्रणाली का सार है। इस सांख्य-योग की पूर्णता परम सत्य के लिए भक्ति सेवा में होती है।
