तदस्य संसृतिर्बन्ध: पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् ।
भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मन: ॥ ७ ॥
अनुवाद
भौतिक चेतना ही मनुष्य के संसारिक जीवन का मूल कारण है, जिसमें परिस्थितियाँ जीव को अपने अधीन कर लेती हैं। हालाँकि, आत्मा कुछ भी नहीं करती और ऐसी गतिविधियों से परे है, लेकिन इस प्रकार वह संसारिक जीवन से प्रभावित होती है।
Material consciousness is the cause of man's conditioned life, in which circumstances dominate the soul. Although the soul does not do anything and remains beyond such actions, it is thus affected by conditioned life.
तात्पर्य
मायावादी दार्शनिक, जो सर्वोच्च आत्मा और वैयक्तिक आत्मा के बीच अंतर नहीं करता, वह कहता है कि जीवित व्यक्ति का सांसारिक अस्तित्व उसकी लीला या मनोरंजन है। किंतु "मनोरंजन" शब्द भगवान की सक्रियताओं में व्यस्तता को सूचित करता है। मायावादी इस शब्द का दुरूपयोग करते हैं और कहते हैं कि भले ही जीवित व्यक्ति मलमूत्र खाने वाला सूअर बन गया हो, फिर भी वह अपने मनोरंजन का आनंद ले रहा है। यह एक अति खतरनाक व्याख्या है। वास्तव में सर्वोच्च भगवान सभी जीवित प्राणियों के नेता और पालनकर्ता हैं। उनके मनोरंजन किसी भी भौतिक क्रिया से परे हैं। भगवान के ऐसे मनोरंजन को जीवित प्राणियों की सांसारिक सक्रियताओं के स्तर तक नहीं घसीटा जा सकता है। सांसारिक जीवन में जीवित व्यक्ति वास्तव में भौतिक ऊर्जा के हाथों बंदी की तरह बना रहता है। भौतिक ऊर्जा जो भी आदेश देती है, सांसारिक आत्मा वही करती है। उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है; वह केवल क्रिया का साक्षी मात्र है, लेकिन कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध का अपमान करने के कारण वह उस तरह कार्य करने के लिए विवश है। इसलिए भगवान कृष्ण भगवद गीता में कहते हैं कि उनकी भौतिक ऊर्जा माया इतनी ताकतवर है कि उससे पार पाना असंभव है। पर यदि कोई जीवित प्राणी यह समझ ले कि उसकी संवैधानिक स्थिति कृष्ण की सेवा करना है और वह इस सिद्धांत के अनुसार कार्य करने का प्रयास करता है, तो वह चाहे कितना भी सांसारिक क्यों न हो, माया का प्रभाव तुरंत नष्ट हो जाता है। भगवद गीता के सातवें अध्याय में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है: कृष्ण उन सबकी जिम्मेदारी लेते हैं जो असहायता में उनके समक्ष आत्मसमर्पण करते हैं और इस प्रकार माया या सांसारिक जीवन का प्रभाव हट जाता है। आत्मा वास्तव में सच्चिदानंद है - नित्य, आनंद से परिपूर्ण और ज्ञान से परिपूर्ण। हालाँकि, माया के चंगुल में वह लगातार जन्म, मृत्यु, रोग और वृद्धावस्था से पीड़ित रहता है। भौतिक अस्तित्व की इस स्थिति से उबरने और कृष्ण चेतना में स्थानांतरित करने के लिए गंभीर होना पड़ता है, क्योंकि इस प्रकार इसकी लंबी पीड़ा आसानी से कम की जा सकती है। संक्षेप में, सांसारिक जीव की पीड़ा भौतिक प्रकृति से उसके लगाव के कारण होती है। इसलिए इस लगाव को पदार्थ से स्थानांतरित करके कृष्ण को दिया जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥