श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  3.26.61 
मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पति: ।
अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत् ॥ ६१ ॥
 
 
अनुवाद
मन के बाद चाँद प्रकट हुआ। फिर बुद्धि और बुद्धि के बाद ब्रह्मा जी प्रकट हुए। फिर अहंकार और उसके बाद शिव जी और शिव जी के बाद चेतना और चेतना का देवता प्रकट हुआ।
 
After the mind, the moon appeared. Then intellect and after intellect, Brahma appeared. Then ego, then Shiva and after Shiva, consciousness and the presiding deity of consciousness appeared.
तात्पर्य
मन के उदय के पश्चात् चंद्रमा का उदय होता है और यह इस बात को इंगित करता है कि चंद्रमा मन का अधिष्ठाता देव है। ठीक वैसे ही, बुद्धि के पश्चात् भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं और बुद्धि के अधिष्ठाता देव हैं और भगवान शिव, जो अहंकार के बाद प्रकट हुए, अहंकार के अधिष्ठाता देव हैं। दूसरे शब्दों में, यह इंगित किया गया है कि चंद्र देव सतोगुण में हैं, जबकि भगवान ब्रह्मा रजोगुण में है और भगवान शिव तमोगुण में हैं। अहंकार के प्रकट होने के पश्चात चेतना का प्रकट होना इंगित करता है कि आरंभ से ही भौतिक चेतना अज्ञान के गुण के अधीन है और कोई अपनी चेतना को शुद्ध करके स्वयं को शुद्ध कर सकता है। इस शुद्धिकरण प्रक्रिया को कृष्ण चेतना कहा जाता है। जैसे ही चेतना शुद्ध हो जाती है, अहंकार मिट जाता है। शरीर की आत्मा के साथ पहचान को मिथ्या पहचान या अहंकार कहा जाता है। भगवान चैतन्य ने अपने शिशाष्टक में इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा है कि महामंत्र, हरे कृष्ण का जप करने का पहला परिणाम यह होता है कि चेतना या मन के दर्पण से गंदगी साफ़ हो जाती है और फिर एक बार भौतिक अस्तित्व की जलती हुई आग खत्म हो जाती है। भौतिक अस्तित्व की जलती हुई आग अहंकार के कारण होती है, लेकिन जैसे ही अहंकार हटा दिया जाता है, कोई अपनी वास्तविक पहचान समझ सकता है। उस समय वह वास्तव में माया के चंगुल से मुक्त हो जाता है। जैसे ही कोई अहंकार के चंगुल से मुक्त होता है, उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो जाती है, और फिर उसका मन हमेशा भगवान के चरण कमलों में लगा रहता है।

सर्वोच्च भगवान पूर्णिमा के दिन गौर चंद्र या निर्मल पारलौकिक चंद्र के रूप में प्रकट हुए। भौतिक चंद्रमा पर धब्बे हैं, लेकिन पारलौकिक चंद्रमा पर, गौर चंद्र पर कोई धब्बे नहीं हैं। सर्वोच्च भगवान की सेवा में शुद्ध मन को स्थापित करने के लिए, गौरचंद्र निर्मल चंद्र की पूजा करनी होती है। जो लोग भौतिक रूप से भावुक हैं या जो जीवन में भौतिक उन्नति के लिए अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करना चाहते हैं, वे सामान्य रूप से भगवान ब्रह्मा के उपासक होते हैं, और जो लोग शरीर के साथ पहचान करने की घोर अज्ञानता में हैं, वे भगवान शिव की पूजा करते हैं। हिरण्यकशिपु और रावण जैसे भौतिकवादी भगवान ब्रह्मा या भगवान शिव के उपासक हैं, लेकिन प्रह्लाद और कृष्ण चेतना की सेवा में अन्य भक्त भगवान, भगवान के व्यक्तित्व की पूजा करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)