श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.26.6 
एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृते: पुमान् ।
कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
विस्मृति के कारण दिव्य जीव प्रकृति के प्रभाव को अपना कार्यक्षेत्र मान लेता है और इस प्रकार प्रेरित होकर गलती से स्वयं को कर्मों का कर्ता मानता है।
 
Due to his forgetfulness, the divine soul considers the influence of Nature as his field of action and, being thus inspired, mistakenly believes himself to be the doer of the actions.
तात्पर्य
विस्मृतिपूर्ण आत्मा की तुलना उस व्यक्ति से की जा सकती है जो रोग के प्रभाव में हो और पागल हो गया हो या भूत-प्रेतों से घिरा हो, जो बिना नियंत्रण के कार्य करता है और फिर भी खुद को नियंत्रण में मानता है। भौतिक प्रकृति के प्रभाव में, बंधी हुई आत्मा भौतिक चेतना में लीन हो जाती है। इस चेतना में, भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में जो कुछ भी किया जाता है उसे वातानुकूलित आत्मा आत्म-प्रेरित मानती है। वास्तव में, अपने शुद्ध अस्तित्व की स्थिति में आत्मा को कृष्ण चेतना में होना चाहिए। जब कोई व्यक्ति कृष्ण चेतना में कार्य नहीं कर रहा होता है, तो उसे भौतिक चेतना में कार्य करने वाला समझा जाता है। चेतना को मारा नहीं जा सकता, क्योंकि जीवित प्राणी का लक्षण चेतना है। भौतिक चेतना को बस शुद्ध करना होता है। कोई कृष्ण, या सर्वोच्च भगवान को स्वामी के रूप में स्वीकार करके और चेतना के तरीके को भौतिक चेतना से कृष्ण चेतना में बदलकर मुक्त हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)