श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.26.57 
रेतस्तस्मादाप आसन्निरभिद्यत वै गुदम् ।
गुदादपानोऽपानाच्च मृत्युर्लोकभयङ्कर: ॥ ५७ ॥
 
 
अनुवाद
इसके पश्चात, वीर्य (उत्पत्ति की क्षमता) और जल के नियंत्रक देवता प्रकट हुए। इसके बाद एक गुदा और फिर मल-त्याग करने के अंग और उसके बाद मृत्यु का देवता प्रकट हुआ, जिससे पूरा ब्रह्माण्ड भयभीत रहता है।
 
Thereafter, the presiding deity of semen (fertility) and water appeared. Then the anus and its organs and after that also the god of death appeared, due to whom the entire universe remains afraid.
तात्पर्य
इस समझ के साथ कि वीर्य निःसरण मौत का कारण है। योगियों और दार्शनिक जो लंबे समय तक जीना चाहते हैं, जानबूझकर वीर्य निःसरण से खुद को रोकते हैं। जितना कोई वीर्य निःसरण को रोकता है, उतना ही ज्यादा वह मौत की समस्या से दूर हो जाता है। इस प्रक्रिया से बहुत से योगी तीन सौ या सात सौ साल तक जीवित रहे हैं और भगवतम में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है की वीर्य निःसरण भयानक मौत का कारण है। जितना ज्यादा कोई यौन भोग में लिप्त रहता है, वह उतना ही जल्दी मृत्यु के शिकंजे में जकड़ा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)