श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.26.54 
निरभिद्यतास्य प्रथमं मुखं वाणी ततोऽभवत् ।
वाण्या वह्निरथो नासे प्राणोतो घ्राण एतयो: ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
सबसे पहले उनके मुँह का उदय हुआ और फिर वाणी का इंद्रिय और इसके साथ अग्नि देवता प्रकट हुए, जो इस इंद्रिय के अधिष्ठाता देवता हैं। तब दो नथुने प्रकट हुए, जिनमें घ्राणेंद्रिय और प्राण प्रकट हुए।
 
First his face appeared, then his speech organ and along with it Agni Dev appeared, who is the presiding deity of this organ. Then two nostrils appeared and in them the sense of smell and life appeared.
तात्पर्य
वाणी के उदय से अग्नि का उदय हुआ, एवं नासिका के उदय से प्राणवायु, श्वसन क्रिया और घ्राणेंद्रिय का भी उदय हुआ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)