इस भौतिक संसार में जीवन की 8,400,000 प्रजातियाँ हैं। आत्मरूपी होने के कारण, वे सभी इस भौतिक संसार से परे हैं। फिर, वे जीवन के विभिन्न चरणों में स्वयं को क्यों प्रकट करते हैं? यहाँ उत्तर दिया गया है: वे भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में हैं। क्योंकि वे भौतिक ऊर्जा द्वारा निर्मित हैं, उनके शरीर भौतिक तत्वों से बने हैं। भौतिक शरीर से ढके होने के कारण, आध्यात्मिक पहचान खो जाती है, और इसलिए यहाँ मumuhe शब्द का उपयोग किया गया है, जो दर्शाता है कि वे अपनी आध्यात्मिक पहचान भूल गए हैं। आध्यात्मिक पहचान का यह विस्मरण जीवों या आत्माओं में मौजूद है, जो इस शर्त के साथ हैं कि वे भौतिक प्रकृति की ऊर्जा से ढके होने के अधीन हैं। Jñāna-gūhayā एक और शब्द है जिसका उपयोग किया गया है। गुहा का अर्थ है "आवरण"। चूँकि सूक्ष्म सशर्त आत्माओं का ज्ञान आच्छादित है, इसलिए वे जीवन की इतनी सारी प्रजातियों में प्रदर्शित होती हैं। श्रीमद्भगवतम, प्रथम सर्ग, सातवें अध्याय में कहा गया है: "भौतिक ऊर्जा से जीवों को मोह होता है।" वेदों में भी यह कहा गया है कि शाश्वत जीवित संस्थाएँ विभिन्न प्रकारों से ढकी हुई हैं और उन्हें त्रिवर्ण - लाल, सफेद और नीला - जीवित संस्थाएँ कहा जाता है। लाल राजस गुण का प्रतिनिधित्व करता है, सफेद सत्व गुण का प्रतिनिधित्व करता है, और नीला तमोगुण का प्रतिनिधित्व करता है। भौतिक प्रकृति के ये गुण भौतिक ऊर्जा से संबंधित हैं, और इसलिए भौतिक प्रकृति के इन विभिन्न गुणों के अंतर्गत जीवित संस्थाओं के विभिन्न प्रकार के भौतिक शरीर होते हैं। क्योंकि वे अपनी आध्यात्मिक पहचान भूल गए हैं, वे भौतिक शरीर को स्वयं समझते हैं। सशर्त आत्मा के लिए, "मैं" का अर्थ है भौतिक शरीर। इसे मोह या विमोह कहते हैं। कठ उपनिषद में बार-बार कहा गया है कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व भौतिक प्रकृति के प्रभाव से कभी प्रभावित नहीं होते हैं। बल्कि, यह सशर्त आत्माएँ या सर्वोच्च के सूक्ष्म असीम अंग और पार्सल हैं, जो भौतिक प्रकृति के प्रभाव से प्रभावित होते हैं और जो भौतिक प्रकारों के तहत विभिन्न शरीरों में प्रकट होते हैं।
