श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.26.47 
नभोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्छ्रोत्रमुच्यते ।
वायोर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य तत्स्पर्शनं विदु: ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
वह ज्ञानेन्द्रिय जिसका अनुभव करने का विषय शब्द है, श्रवणेन्द्रिय कहलाती है और जिसका अनुभव करने का विषय स्पर्श है, वह स्पर्शेन्द्रिय कहलाती है।
 
The sense organ whose subject is sound is called the sense of hearing and whose subject is touch is called the sense of touch.
तात्पर्य
ध्वनि आकाश की एक योग्यता है और श्रवण का विषय है। इसी प्रकार, स्पर्श हवा की योग्यता है और स्पर्श संवेदना का विषय है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)