ब्रह्म-संहिता में भगवान कृष्ण की भूमि, आध्यात्मिक निवास की विविधता और भगवान के उस रूपों का वर्णन है, जिसमें वे अपनी आध्यात्मिक विशिष्टता के साथ बांसुरी बजा रहे हैं। इन सभी रूपों का वर्णन शास्त्रों में किया गया है और जब वे इस प्रकार से प्रस्तुत किए जाते हैं तो वे पूजा करने योग्य हो जाते हैं। वे किसी कल्पना के नहीं होते हैं, जैसा कि मायावादी दर्शन में कहा जाता है। कभी-कभी "भावना" शब्द का गलत अर्थ "कल्पना" के रूप में लिया जाता है। लेकिन भावना का अर्थ "कल्पना" नहीं है, इसका अर्थ वैदिक साहित्य के विवरण को वास्तविक रूप देना है। धरती सारी सजीव चीजों और उनके अपने-अपने प्रकार के भौतिक प्रकृति का अंतिम रूपांतरण है।
