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bhagavat 3.26.44: पानी से स्वाद का अनुभव होता है और उसके साथ मिलकर देवी विधान के कारण गंध तन्मात्रा का जन्म होता है। इससे पृथ्वी और घ्राण इंद्रिय की उत्पत्ति होती है जिसके द्वारा हम पृथ्वी के सुखद और विविध गंध का अनुभव कर पाते हैं।   |   bhagavat अध्याय 3.26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.26.44 
रसमात्राद्विकुर्वाणादम्भसो दैवचोदितात् ।
गन्धमात्रमभूत्तस्मात्पृथ्वी घ्राणस्तु गन्धग: ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
पानी से स्वाद का अनुभव होता है और उसके साथ मिलकर देवी विधान के कारण गंध तन्मात्रा का जन्म होता है। इससे पृथ्वी और घ्राण इंद्रिय की उत्पत्ति होती है जिसके द्वारा हम पृथ्वी के सुखद और विविध गंध का अनुभव कर पाते हैं।
 
As a result of the interaction of taste perception and water, the tanmatra of smell is generated by divine law. From that, earth and the sense of smell are generated, through which we can experience the fragrance of earth in many ways.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)