श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.26.35 
नभस: शब्दतन्मात्रात्कालगत्या विकुर्वत: ।
स्पर्शोऽभवत्ततो वायुस्त्वक्स्पर्शस्य च संग्रह: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
शुरुआती अस्तित्व, जो ध्वनि से विकसित होता है, उसका अगला रूपांतरण समय के आवेग के तहत होता है, और इस तरह स्पर्श सूक्ष्म तत्व और फिर हवा और स्पर्श इंद्रिय प्रमुख हो जाती है।
 
In the space which produces sound, a disorder is created due to the speed of time and in this way the tanmaatr of touch is manifested. From this, air and the sense of touch are again created.
तात्पर्य
समय के क्रम में जब सूक्ष्म रूप स्थूल रूपों में रूपांतरित होते हैं, तो वे स्पर्श की वस्तुएँ बन जाते हैं। स्पर्श की वस्तुएँ और इस स्पर्श संवेदना का विकास भी समय के इस क्रम में होता है। ध्वनि पहली संवेदी वस्तु है जो भौतिक अस्तित्व प्रदर्शित करती है और ध्वनि की अनुभूति से स्पर्श अनुभूति का विकास होता है और स्पर्श अनुभूति से दृश्य की अनुभूति का विकास होता है। यह हमारी संवेदी वस्तुओं के क्रमिक विकास का क्रम है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)