हम जो भी शब्द सुनते हैं, उसके पीछे एक अर्थ होता है। जैसे ही हम "जल" शब्द सुनते हैं, शब्द के पीछे एक पदार्थ - जल - है। इसी तरह, जैसे ही हम "ईश्वर" शब्द सुनते हैं, इसका एक अर्थ है। यदि हम ईश्वर का वह अर्थ और व्याख्या ईश्वर से स्वयं प्राप्त करते हैं, तो यह पूर्ण है। लेकिन यदि हम "ईश्वर" के अर्थ पर विचार करते हैं, तो यह अपूर्ण है। भगवद्-गीता, जो ईश्वर का विज्ञान है, स्वयं भगवान के व्यक्तित्व द्वारा बोली जाती है। यह पूर्ण ज्ञान है। मानसिक विचारक या तथाकथित दार्शनिक जो शोध कर रहे हैं कि वास्तव में ईश्वर क्या है, वे कभी भी ईश्वर के स्वरूप को नहीं समझ पाएंगे। ईश्वर के विज्ञान को ब्रह्मा से शिष्य परंपरा में समझा जाना है, जिन्हें पहली बार ईश्वर द्वारा स्वयं ईश्वर के ज्ञान के बारे में निर्देश दिया गया था। हम भगवद्-गीता को शिष्य परंपरा में अधिकृत व्यक्ति से सुनकर ईश्वर के ज्ञान को समझ सकते हैं।
जब हम देखने की बात करते हैं, तो रूप होना चाहिए। हमारी इंद्रिय धारणा से, प्रारंभिक अनुभव आकाश है। आकाश रूप की शुरुआत है। और आकाश से, अन्य रूप निकलते हैं। इसलिए ज्ञान और इंद्रिय धारणा की वस्तुएँ आकाश से ही प्रारंभ होती हैं।
