श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.26.33 
अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च ।
तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदु: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
शब्दज्ञ और वास्तविक ज्ञानवान व्यक्ति शब्द की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि शब्द वस्तु के अर्थ को वहन करता है, पर्दे के पीछे बैठे वक्ता की उपस्थिति को बताता है और यह आकाश का सूक्ष्म रूप होता है।
 
Those who are learned and possessed of true knowledge define word as that which carries the idea (meaning) of a thing, indicates the presence of the speaker standing in cover and is the subtle form of sky.
तात्पर्य
यह यहाँ बहुत स्पष्ट है कि जैसे ही हम श्रवण की बात करते हैं, वहाँ एक वक्ता होना चाहिए; बिना वक्ता के श्रवण का कोई प्रश्न नहीं है। इसलिए वैदिक ज्ञान, जिसे श्रुति के रूप में जाना जाता है, या जो श्रवण द्वारा प्राप्त किया जाता है, उसे अपौरुष भी कहा जाता है। अपौरुष का अर्थ है "भौतिक रूप से निर्मित किसी भी व्यक्ति द्वारा बोला नहीं गया।" श्रीमद्-भागवतम् के आरंभ में कहा गया है, तेन ब्रह्म हृदा। ब्रह्म या वेद की ध्वनि को सर्वप्रथम आदि-कवि ब्रह्मा के हृदय में प्रतिष्ठापित किया गया था। वे कैसे विद्वान बने? जब भी सीखना होता है, एक वक्ता और श्रवण की प्रक्रिया होनी चाहिए। लेकिन ब्रह्मा पहले सृजित प्राणी थे। उनसे किसने बात की? चूँकि कोई नहीं था, तो ज्ञान देने वाला गुरु कौन था? वे एकमात्र जीवित प्राणी थे; इसलिए वैदिक ज्ञान उनके हृदय में परमात्मा के रूप में विराजमान सर्वोच्च व्यक्तित्व के भगवान द्वारा दिया गया था। वैदिक ज्ञान को सर्वोच्च प्रभु द्वारा बोला गया समझा जाता है, और इसलिए यह भौतिक समझ के दोषों से मुक्त है। भौतिक समझ दोषपूर्ण है। यदि हम किसी वातानुकूलित आत्मा से कुछ सुनते हैं, तो वह दोषों से भरा होता है। सभी भौतिक और सांसारिक जानकारी भ्रम, त्रुटि, धोखा और इंद्रियों की अपूर्णता से दूषित है। क्योंकि वैदिक ज्ञान सर्वोच्च प्रभु द्वारा दिया गया था, जो भौतिक सृष्टि के लिए पारलौकिक है, यह पूर्ण है। यदि हम ब्रह्मा से शिष्य परंपरा में उस वैदिक ज्ञान को प्राप्त करते हैं, तो हमें पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।

हम जो भी शब्द सुनते हैं, उसके पीछे एक अर्थ होता है। जैसे ही हम "जल" शब्द सुनते हैं, शब्द के पीछे एक पदार्थ - जल - है। इसी तरह, जैसे ही हम "ईश्वर" शब्द सुनते हैं, इसका एक अर्थ है। यदि हम ईश्वर का वह अर्थ और व्याख्या ईश्वर से स्वयं प्राप्त करते हैं, तो यह पूर्ण है। लेकिन यदि हम "ईश्वर" के अर्थ पर विचार करते हैं, तो यह अपूर्ण है। भगवद्-गीता, जो ईश्वर का विज्ञान है, स्वयं भगवान के व्यक्तित्व द्वारा बोली जाती है। यह पूर्ण ज्ञान है। मानसिक विचारक या तथाकथित दार्शनिक जो शोध कर रहे हैं कि वास्तव में ईश्वर क्या है, वे कभी भी ईश्वर के स्वरूप को नहीं समझ पाएंगे। ईश्वर के विज्ञान को ब्रह्मा से शिष्य परंपरा में समझा जाना है, जिन्हें पहली बार ईश्वर द्वारा स्वयं ईश्वर के ज्ञान के बारे में निर्देश दिया गया था। हम भगवद्-गीता को शिष्य परंपरा में अधिकृत व्यक्ति से सुनकर ईश्वर के ज्ञान को समझ सकते हैं।

जब हम देखने की बात करते हैं, तो रूप होना चाहिए। हमारी इंद्रिय धारणा से, प्रारंभिक अनुभव आकाश है। आकाश रूप की शुरुआत है। और आकाश से, अन्य रूप निकलते हैं। इसलिए ज्ञान और इंद्रिय धारणा की वस्तुएँ आकाश से ही प्रारंभ होती हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)