श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.26.32 
तामसाच्च विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यचोदितात् ।
शब्दमात्रमभूत्तस्मान्नभ: श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जब अज्ञान में डूबा हुआ अहंकार, परम पुरुष भगवान की यौन शक्ति से उत्तेजित होता है, तो सूक्ष्म तत्व ध्वनि प्रकट होती है, और ध्वनि से आकाश तत्व और श्रवण शक्ति उत्पन्न होती है।
 
When the Tamasic ego is inspired by the semen (lust) power of the Lord, the subtle Shabda element appears and from the Shabda arise the sky and from it the organs of hearing.
तात्पर्य
इस पद से ऐसा लगता है कि हमारी सभी ज्ञानेन्द्रिय संतुष्टि के साधन अज्ञान में अहंकार के उत्पाद हैं। इस पद से यह समझा जाता है कि अज्ञान में अहंकार तत्व के आंदोलन से सबसे पहले ध्वनि उत्पन्न हुई, जो ईथर का सूक्ष्म रूप है। वेदांत सूत्र में भी यह कहा गया है कि ध्वनी भौतिक संपत्ति के सभी वस्तुओं का मूल है और ध्वनि से कोई भी इस भौतिक अस्तित्व को विघटित कर सकता है। अनवरतिः शब्दात का अर्थ है "ध्वनि से मुक्ति।" संपूर्ण भौतिक अभिव्यक्ति ध्वनि से शुरू हुई, और यदि ध्वनि में एक विशेष शक्ति है तो यह भौतिक उलझाव को भी समाप्त कर सकती है। ऐसा करने में सक्षम विशेष ध्वनि हरे कृष्ण का पारलौकिक कंपन है। भौतिक मामलों में हमारे उलझाव की शुरुआत भौतिक ध्वनि से हुई है। अब हमें उस ध्वनि को आध्यात्मिक समझ में शुद्ध करना होगा। आध्यात्मिक दुनिया में भी ध्वनि है। यदि हम उस ध्वनि के करीब पहुँचे, तो हमारा आध्यात्मिक जीवन शुरू हो जाता है, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति की जा सकती है। हमें बहुत स्पष्ट रूप से समझना होगा कि हमारे इंद्रिय सुख के लिए सभी भौतिक वस्तुओं के निर्माण की शुरुआत ध्वनि है। इसी तरह ध्वनि को शुद्ध किया जाता है तो हमारी आध्यात्मिक आवश्यकताओं का भी ध्वनि से निर्माण होता है। यहाँ यह कहा गया है कि ध्वनि से ईथर प्रकट हुआ और ईथर से वायु प्रकट हुई। ईथर आकाश ध्वनि से कैसे आता है, वायु आकाश से कैसे आती है और आग वायु से कैसे आती है, यह बाद में समझाया जाएगा। ध्वनि आकाश का कारण है, और आकाश श्रवण इंद्रिय का कारण है। कोई भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रवण इंद्रिय पहली इंद्रिय है। कोई भी ज्ञान, चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक उसे प्राप्त करने के लिए श्रवण ग्रहण करना होगा। इसलिए श्रवण इंद्रिय बहुत महत्वपूर्ण है। वैदिक ज्ञान को श्रुति कहा जाता है; ज्ञान को श्रवण द्वारा प्राप्त करना होता है। हम भौतिक या आध्यात्मिक आनंद को प्राप्त केवल उसी से कर सकते है। भौतिक जगत में हम अपने भौतिक आराम के लिए कई चीजों का निर्माण करते हैं केवल श्रवण द्वारा। वे पहले से ही वहां हैं, लेकिन केवल श्रवण द्वारा, कोई उन्हें रूपांतरित कर सकता है। यदि हम एक बहुत ऊंची गगनचुंबी इमारत बनाना चाहते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हमें इसे ही बनाना होगा। गगनचुंबी इमारत की सामग्री - लकड़ी, धातु, पृथ्वी, आदि - पहले से ही वहां हैं, लेकिन हम उन पहले से बनाए गए भौतिक तत्वों के साथ अपना घनिष्ठ संबंध बनाते हैं कि उनका उपयोग कैसे किया जाए। निर्माण के लिए आधुनिक आर्थिक उन्नति भी सुनने का एक उत्पाद है, और इसी तरह कोई सही स्रोत से सुनकर आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए अनुकूल क्षेत्र बना सकता है। अर्जुन जीवन के शारीरिक गर्भधारण में एक स्थूल भौतिकवादी था और शारीरिक गर्भधारण से बहुत तेजी से पीड़ित था। लेकिन केवल सुनकर, अर्जुन एक आध्यात्मिक, कृष्णभावनामावेव व्यक्ति बन गया। श्रवण बहुत महत्वपूर्ण है, और वह आकाश से उत्पन्न होता है। केवल श्रवण करके ही हम पहले से मौजूद चीजों का उचित उपयोग कर सकते हैं। पूर्वनिर्मित सामग्रियों का उपयोग करने के लिए सुनने के सिद्धांत को आध्यात्मिक उपकरणों पर भी लागू किया जाता है। हमें उचित आध्यात्मिक स्रोत से सुनना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)