इस छंद में यह स्पष्ट है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंद्रियाँ और क्रिया के लिए इंद्रियाँ दोनों जुनून के तरीके में अहंकार के उत्पाद हैं। और क्योंकि गतिविधि के लिए और ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंद्रिय अंगों को ऊर्जा, या जीवन ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए प्राण ऊर्जा, या जीवन ऊर्जा भी जुनून के तरीके से अहंकार द्वारा उत्पन्न होती है। इसलिए हम वास्तव में देख सकते हैं कि जो लोग बहुत भावुक होते हैं वे भौतिक अधिग्रहण में बहुत तेज़ी से सुधार कर सकते हैं। वैदिक शास्त्रों में यह सिफारिश की गई है कि अगर कोई व्यक्ति भौतिक संपत्ति प्राप्त करने में किसी व्यक्ति को प्रोत्साहित करना चाहता है, तो उसे उसे यौन जीवन में भी प्रोत्साहित करना चाहिए। हम स्वाभाविक रूप से पाते हैं कि जो लोग यौन जीवन के आदी हैं वे भी भौतिक रूप से उन्नत हैं क्योंकि यौन जीवन या जुनूनी जीवन सभ्यता की भौतिक उन्नति के लिए प्रेरणा है। जो लोग आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हैं, उनके लिए जुनून का तरीका लगभग नहीं है। केवल अच्छाई का तरीका प्रमुख है। हम पाते हैं कि जो लोग कृष्ण चेतना में संलग्न हैं वे भौतिक रूप से गरीब हैं, लेकिन जिसकी आँखें हैं वह देख सकता है कि कौन बड़ा है। हालाँकि वह भौतिक रूप से गरीब दिखाई देता है, लेकिन कृष्ण चेतना में एक व्यक्ति वास्तव में एक गरीब आदमी नहीं है, लेकिन वह व्यक्ति जिसके पास कृष्ण चेतना के लिए कोई स्वाद नहीं है और जो भौतिक संपत्ति के साथ बहुत खुश दिखाई देता है वह वास्तव में गरीब है। भौतिक चेतना से प्रभावित व्यक्ति भौतिक सुखों के लिए चीजों को खोजने में बहुत बुद्धिमान होते हैं, लेकिन उनकी आत्मा और आध्यात्मिक जीवन को समझने तक उनकी कोई पहुँच नहीं होती है। इसलिए अगर कोई आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहता है, तो उसे शुद्ध इच्छा के मंच पर वापस आना होगा, भक्ति सेवा के लिए शुद्ध इच्छा। जैसा कि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, कृष्ण चेतना में इंद्रियों के शुद्ध होने पर भगवान की सेवा में संलग्नता को शुद्ध भक्ति कहा जाता है।
