श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.26.31 
तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागश: ।
प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
रजोगुण प्रधान अहंकार से दो प्रकार की ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न होती हैं। एक है जानकारी प्राप्त करने की ज्ञानेन्द्रियां और दूसरी है कर्म करने की इन्द्रियाँ। कर्म करने की ज्ञानेन्द्रियां प्राणशक्ति पर निर्भर होती हैं, जबकि जानकारी प्राप्त करने की ज्ञानेन्द्रियां बुद्धि पर निर्भर करती हैं।
 
Two types of senses arise from Rajoguni ego – sense organs and action senses. The senses of action are dependent on the life force and the senses of knowledge are dependent on the intellect.
तात्पर्य
पिछले छंदों में बताया गया है कि मन अच्छाई में अहंकार का उत्पाद है और मन का कार्य इच्छा के अनुसार स्वीकृति और अस्वीकृति है। लेकिन यहाँ बुद्धि को जुनून में अहंकार का उत्पाद कहा गया है। मन और बुद्धि में यही अंतर है: मन अच्छाई में अहंकार का उत्पाद है, और बुद्धि जुनून में अहंकार का उत्पाद है। कुछ स्वीकार करने और किसी चीज़ को अस्वीकार करने की इच्छा मन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। चूंकि मन अच्छाई के तरीके का एक उत्पाद है, अगर वह मन के भगवान, अनिरुद्ध पर तय हो जाता है, तो मन को कृष्ण चेतना में बदला जा सकता है। नरसिम्हा दास ठाकुर ने कहा है कि हममें हमेशा इच्छाएँ होती हैं। इच्छा को रोका नहीं जा सकता। लेकिन अगर हम अपनी इच्छाओं को परमेश्वर को खुश करने के लिए स्थानांतरित करते हैं, तो यही जीवन की पूर्णता है। जैसे ही इच्छा भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व की ओर स्थानांतरित हो जाती है, वह पदार्थ से दूषित हो जाती है। इच्छा को शुद्ध करना पड़ता है। शुरुआत में, इस शुद्धिकरण प्रक्रिया को आध्यात्मिक गुरु के आदेश से करना पड़ता है, क्योंकि आध्यात्मिक गुरु जानता है कि शिष्य की इच्छाओं को कृष्ण चेतना में कैसे बदला जा सकता है। जहाँ तक बुद्धि का सवाल है, तो यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह जुनून में अहंकार का उत्पाद है। अभ्यास से व्यक्ति अच्छाई के तरीके के बिंदु पर आता है, और आत्मसमर्पण या मन को परमेश्वर पर स्थिर करने से, वह एक बहुत महान व्यक्तित्व, या महात्मा बन जाता है। भगवद-गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है, सा महात्मा सुदुर्लभ: "ऐसी महान आत्मा बहुत दुर्लभ है।"

इस छंद में यह स्पष्ट है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंद्रियाँ और क्रिया के लिए इंद्रियाँ दोनों जुनून के तरीके में अहंकार के उत्पाद हैं। और क्योंकि गतिविधि के लिए और ज्ञान प्राप्त करने के लिए इंद्रिय अंगों को ऊर्जा, या जीवन ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसलिए प्राण ऊर्जा, या जीवन ऊर्जा भी जुनून के तरीके से अहंकार द्वारा उत्पन्न होती है। इसलिए हम वास्तव में देख सकते हैं कि जो लोग बहुत भावुक होते हैं वे भौतिक अधिग्रहण में बहुत तेज़ी से सुधार कर सकते हैं। वैदिक शास्त्रों में यह सिफारिश की गई है कि अगर कोई व्यक्ति भौतिक संपत्ति प्राप्त करने में किसी व्यक्ति को प्रोत्साहित करना चाहता है, तो उसे उसे यौन जीवन में भी प्रोत्साहित करना चाहिए। हम स्वाभाविक रूप से पाते हैं कि जो लोग यौन जीवन के आदी हैं वे भी भौतिक रूप से उन्नत हैं क्योंकि यौन जीवन या जुनूनी जीवन सभ्यता की भौतिक उन्नति के लिए प्रेरणा है। जो लोग आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हैं, उनके लिए जुनून का तरीका लगभग नहीं है। केवल अच्छाई का तरीका प्रमुख है। हम पाते हैं कि जो लोग कृष्ण चेतना में संलग्न हैं वे भौतिक रूप से गरीब हैं, लेकिन जिसकी आँखें हैं वह देख सकता है कि कौन बड़ा है। हालाँकि वह भौतिक रूप से गरीब दिखाई देता है, लेकिन कृष्ण चेतना में एक व्यक्ति वास्तव में एक गरीब आदमी नहीं है, लेकिन वह व्यक्ति जिसके पास कृष्ण चेतना के लिए कोई स्वाद नहीं है और जो भौतिक संपत्ति के साथ बहुत खुश दिखाई देता है वह वास्तव में गरीब है। भौतिक चेतना से प्रभावित व्यक्ति भौतिक सुखों के लिए चीजों को खोजने में बहुत बुद्धिमान होते हैं, लेकिन उनकी आत्मा और आध्यात्मिक जीवन को समझने तक उनकी कोई पहुँच नहीं होती है। इसलिए अगर कोई आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना चाहता है, तो उसे शुद्ध इच्छा के मंच पर वापस आना होगा, भक्ति सेवा के लिए शुद्ध इच्छा। जैसा कि नारद-पंचरात्र में कहा गया है, कृष्ण चेतना में इंद्रियों के शुद्ध होने पर भगवान की सेवा में संलग्नता को शुद्ध भक्ति कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)