श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.26.30 
संशयोऽथ विपर्यासो निश्चय: स्मृतिरेव च ।
स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तित: पृथक् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
विभिन्न कार्यों द्वारा निर्धारित सन्देह, ग़लतफ़हमी, सही समझ, याददाश्त और नींद, बुद्धि की विशिष्ट विशेषताएं हैं।
 
Doubt, contrary knowledge, correct knowledge, memory and sleep, these are determined by their different functions and these are the clear characteristics of the intellect.
तात्पर्य
संशय बुद्धि के महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है; किसी बात को अंधे तौर पर स्वीकार करना बुद्धि का प्रमाण नहीं देता है। इसलिए संस्कृत शब्द 'संशय' बहुत महत्वपूर्ण है; बुद्धि की साधना के लिए व्यक्ति को शुरुआत में शंकाशील होना चाहिए। लेकिन जब सही स्रोत से जानकारी प्राप्त होती है, तो बहुत अधिक संदेह करना अनुकूल नहीं होता। भगवद-गीता में भगवान कहते हैं कि प्रामाणिक स्रोत से मिली बातों पर संदेह करना विनाश का कारण है।

जैसा कि पतंजलि योग प्रणाली में वर्णित है, प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृतिः। बुद्धि से ही कोई चीजों को वास्तव में वैसा ही समझ सकता है जैसी वो होती हैं। बुद्धि से ही कोई यह समझ सकता है कि वह शरीर है या नहीं। यह निर्धारित करने का अध्ययन कि क्या किसी की पहचान आध्यात्मिक है या भौतिक, संदेह से शुरू होता है। जब कोई अपनी वास्तविक स्थिति का विश्लेषण करने में सक्षम होता है, तो शरीर के साथ झूठी पहचान का पता चलता है। इसे विपर्यय कहा जाता है। जब मिथ्या पहचान का पता चल जाता है, तभी वास्तविक पहचान को समझा जा सकता है। वास्तविक समझ को यहाँ निश्चय या सिद्ध प्रयोगात्मक ज्ञान के रूप में वर्णित किया गया है। यह प्रयोगात्मक ज्ञान तभी प्राप्त हो सकता है जब व्यक्ति को मिथ्या ज्ञान की समझ हो। प्रयोगात्मक या सिद्ध ज्ञान से कोई यह समझ सकता है कि वह शरीर नहीं बल्कि आत्मा है।

स्मृति का अर्थ है "स्मृति," और स्वाप का अर्थ है "नींद।" बुद्धि को कार्यशील रखने के लिए नींद भी आवश्यक है। अगर नींद नहीं है तो दिमाग अच्छी तरह से काम नहीं कर पाता है। भगवद-गीता में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि जो व्यक्ति खाने-पीने, सोने और शरीर की अन्य आवश्यकताओं को उचित अनुपात में नियंत्रित करते हैं, वे योग की प्रक्रिया में बहुत सफल होते हैं। ये पतंजलि योग प्रणाली और श्रीमद्-भागवतम में कपिलदेव की सांख्य दर्शन प्रणाली दोनों में वर्णित बुद्धि के विश्लेषणात्मक अध्ययन के कुछ पहलू हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)