जैसा कि पतंजलि योग प्रणाली में वर्णित है, प्रमाण-विपर्यय-विकल्प-निद्रा-स्मृतिः। बुद्धि से ही कोई चीजों को वास्तव में वैसा ही समझ सकता है जैसी वो होती हैं। बुद्धि से ही कोई यह समझ सकता है कि वह शरीर है या नहीं। यह निर्धारित करने का अध्ययन कि क्या किसी की पहचान आध्यात्मिक है या भौतिक, संदेह से शुरू होता है। जब कोई अपनी वास्तविक स्थिति का विश्लेषण करने में सक्षम होता है, तो शरीर के साथ झूठी पहचान का पता चलता है। इसे विपर्यय कहा जाता है। जब मिथ्या पहचान का पता चल जाता है, तभी वास्तविक पहचान को समझा जा सकता है। वास्तविक समझ को यहाँ निश्चय या सिद्ध प्रयोगात्मक ज्ञान के रूप में वर्णित किया गया है। यह प्रयोगात्मक ज्ञान तभी प्राप्त हो सकता है जब व्यक्ति को मिथ्या ज्ञान की समझ हो। प्रयोगात्मक या सिद्ध ज्ञान से कोई यह समझ सकता है कि वह शरीर नहीं बल्कि आत्मा है।
स्मृति का अर्थ है "स्मृति," और स्वाप का अर्थ है "नींद।" बुद्धि को कार्यशील रखने के लिए नींद भी आवश्यक है। अगर नींद नहीं है तो दिमाग अच्छी तरह से काम नहीं कर पाता है। भगवद-गीता में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि जो व्यक्ति खाने-पीने, सोने और शरीर की अन्य आवश्यकताओं को उचित अनुपात में नियंत्रित करते हैं, वे योग की प्रक्रिया में बहुत सफल होते हैं। ये पतंजलि योग प्रणाली और श्रीमद्-भागवतम में कपिलदेव की सांख्य दर्शन प्रणाली दोनों में वर्णित बुद्धि के विश्लेषणात्मक अध्ययन के कुछ पहलू हैं।
