श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.26.27 
वैकारिकाद्विकुर्वाणान्मनस्तत्त्वमजायत ।
यत्सङ्कल्पविकल्पाभ्यां वर्तते कामसम्भव: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
सत्त्वगुण के अहंकार के कारण एक और विकार आता है। इसी से मन का जन्म होता है, जिसके संकल्पों और विचारों से इच्छाओं का उदय होता है।
 
The second disorder comes from the ego of Sattva. From this, the mind is born, whose resolutions and choices give rise to desires.
तात्पर्य
मन के लक्षण निश्चय और त्याग होते हैं, और ये विभिन्न प्रकार की इच्छाओं के कारण होते हैं। हम उस चीज़ की इच्छा करते हैं जो हमारी इंद्रियतृप्ति के अनुकूल हो, और हम उस चीज़ का त्याग करते हैं जो इंद्रियतृप्ति के अनुकूल न हो। भौतिक मन स्थिर नहीं है, लेकिन यही मन कृष्ण भावना की गतिविधियों में शामिल होने से स्थिर हो सकता है। अन्यथा, जब तक मन भौतिक मंच पर है, तब तक वह भ्रमणशील है, और यह सारा त्याग और स्वीकृति असत है, अस्थायी है। कहा गया है कि जिसका मन कृष्ण भावना में स्थिर नहीं है उसे स्वीकृति और त्याग के बीच भ्रमण करना चाहिए। एक व्यक्ति शैक्षणिक योग्यताओं में चाहे कितना ही उन्नत क्यों न हो, जब तक वह कृष्ण भावना में स्थिर नहीं हो जाता तब तक वह केवल स्वीकार और अस्वीकार करता रहेगा और कभी भी अपने दिमाग को किसी विशेष विषय पर स्थिर नहीं कर पाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)