श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  3.26.23-24 
महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यसम्भवात् ।
क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविध: समपद्यत ॥ २३ ॥
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्च यतो भव: ।
मनसश्चेन्द्रियाणां च भूतानां महतामपि ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
महत् तत्व से अहंकार उत्पन्न होता है, जो कि भगवान की अपनी शक्ति से विकसित हुआ है। अहंकार में मुख्य रूप से तीन प्रकार की क्रियाशक्तियां होती हैं - सत्त्व, रज और तम। इन्हीं तीनों प्रकार के अहंकार से मन, ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ और स्थूल तत्व विकसित होते हैं।
 
Ego arises from Mahat Tattva, which arises from the personal power of God. There are mainly three types of active forces in the ego – Sattva, Raja and Tama. From these three types of ego, mind, sense organs, action organs and gross elements were born.
तात्पर्य
शुरुआत में, स्पष्ट चेतना, या कृष्ण चेतना की शुद्ध अवस्था से, पहला संदूषण उत्पन्न हुआ। इसे मिथ्या अहंकार या शरीर की आत्म-पहचान कहा जाता है। जीवित इकाई कृष्ण-चेतना की स्वाभाविक अवस्था में मौजूद है, लेकिन उसके पास सीमांत स्वतंत्रता है, और यह उसे कृष्ण को भूलने की अनुमति देती है। मूल रूप से, शुद्ध कृष्ण चेतना मौजूद है, लेकिन सीमांत स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण कृष्ण को भूलने का मौका है। यह वास्तविक जीवन में प्रदर्शित होता है; ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें कृष्ण चेतना में कार्य करने वाला कोई व्यक्ति अचानक बदल जाता है। इसलिए उपनिषदों में कहा गया है कि आध्यात्मिक साक्षात्कार का मार्ग उस्तरे की धार की तरह है। उदाहरण बहुत उपयुक्त है। एक व्यक्ति अपने गाल को एक तेज उस्तरे से बहुत अच्छी तरह से शेव करता है, लेकिन जैसे ही उसका ध्यान गतिविधि से हट जाता है, वह तुरंत अपने गाल को काट लेता है क्योंकि वह उस्तरे को गलत तरीके से संभालता है।

व्यक्ति को न केवल शुद्ध कृष्ण चेतना की अवस्था में आना चाहिए, बल्कि उसे बहुत सावधान भी रहना चाहिए। कोई भी असावधानी या लापरवाही पतन का कारण बन सकती है। यह पतन मिथ्या अहंकार के कारण होता है। शुद्ध चेतना की अवस्था से, स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण मिथ्या अहंकार पैदा होता है। हम इस बारे में तर्क नहीं दे सकते कि शुद्ध चेतना से मिथ्या अहंकार क्यों पैदा होता है। तथ्यतः, यह होने की संभावना हमेशा बनी रहती है, और इसलिए सावधानी बरतनी होती है। मिथ्या अहंकार सभी भौतिक गतिविधियों का मूल सिद्धांत है, जो भौतिक प्रकृति के गुणों में निष्पादित की जाती हैं। जैसे ही कोई शुद्ध कृष्ण चेतना से विचलित होता है, वह भौतिक प्रतिक्रिया में अपनी उलझन बढ़ाता है। भौतिकवाद की उलझन भौतिक मन है, और इस भौतिक मन से इंद्रियाँ और भौतिक अंग प्रकट होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)