श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.26.21 
यत्तत्सत्त्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवत: पदम् ।
यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
सतोगुण, जो भगवान की समझ की स्पष्ट, शांत स्थिति है और जिसे आम तौर पर वासुदेव या चेतना कहा जाता है, खुद को महत् तत्त्व में प्रकट करता है।
 
The mode of sattoguna, which is the pure, gentle state of knowledge of the Lord and which is generally called Vasudeva or consciousness, is manifested in the Mahat Tattva.
तात्पर्य
वासुदेव की अभिव्यक्ति, याभगवान के व्यक्तित्व को समझने की स्थिति, शुद्ध गुण, या शुद्ध सत्त्व कहलाती है। शुद्ध सत्त्व की स्थिति में अन्य गुणों का कोई उल्लंघन नहीं होता है, अर्थात "रज" और "तम" नहीं होता है। वैदिक साहित्य में भगवान के चार व्यक्तियों के रूप में विस्तार का उल्लेख है - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। यहाँ महातत्व की पुन: अभिव्यक्ति में भगवान के चार विस्तार होते हैं। जो व्यक्ति अतिआत्मा के रूप में भीतर विराजमान है, वह पहले वासुदेव के रूप में विस्तार करता है।

वासुदेव की अवस्था भौतिक इच्छाओं के उल्लंघन से मुक्त है और ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति भगवद्गीता में "अद्भुत" के रूप में वर्णित सर्वोच्च व्यक्तित्व या उद्देश्य को समझ सकता है। यह महातत्व की एक और विशेषता है। वासुदेव के विस्तार को कृष्ण चेतना भी कहा जाता है, क्योंकि यह भौतिक जुनून और अज्ञानता के सभी रंगों से मुक्त है। समझ की यह स्पष्ट स्थिति भगवान के परम व्यक्तित्व को जानने में मदद करती है। वासुदेव की स्थिति को भगवद्गीता में क्षेत्र-ज्ञ के रूप में भी समझाया गया है, जो गतिविधियों के क्षेत्र के जानकार के साथ-साथ सर्वज्ञानी को भी संदर्भित करता है। जिस जीव ने किसी विशेष प्रकार के शरीर पर अधिकार कर लिया है, वह उस शरीर को जानता है, लेकिन सर्वज्ञानी, वासुदेव, न केवल एक विशेष प्रकार के शरीर को जानता है, बल्कि सभी विभिन्न प्रकार के शरीरों में गतिविधि के क्षेत्र को भी जानता है। स्पष्ट चेतना या कृष्ण चेतना में स्थित होने के लिए, व्यक्ति को वासुदेव की पूजा करनी चाहिए। वासुदेव अकेले कृष्ण हैं। जब कृष्ण, या विष्णु अकेले होते हैं, अपनी आंतरिक ऊर्जा के बिना, वह वासुदेव होते हैं। जब वह अपनी आंतरिक शक्ति के साथ होते हैं, तो उन्हें द्वारकाधीश कहा जाता है। स्पष्ट चेतना या कृष्ण चेतना प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को वासुदेव की पूजा करनी होती है। भगवद्गीता में यह भी समझाया गया है कि कई, कई जन्मों के बाद व्यक्ति वासुदेव के सामने समर्पण कर देता है। ऐसी महान आत्मा बहुत दुर्लभ है।

मिथ्या अहंकार से मुक्त होने के लिए, व्यक्ति को संकर्षण की पूजा करनी होती है। संकर्षण की पूजा भगवान शिव के माध्यम से भी की जाती है; भगवान शिव के शरीर को ढंकने वाले सांप संकर्षण के प्रतिनिधि हैं, और भगवान शिव हमेशा संकर्षण पर ध्यान में लीन रहते हैं। जो व्यक्ति वास्तव में संकर्षण के भक्त के रूप में भगवान शिव का उपासक है, वह झूठे भौतिक अहंकार से मुक्त हो सकता है। यदि कोई मानसिक अशांति से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अनिरुद्ध की पूजा करनी होगी। इस उद्देश्य के लिए, वैदिक साहित्य में चंद्र ग्रह की पूजा की भी सिफारिश की गई है। इसी तरह, अपनी बुद्धि में स्थिर रहने के लिए, व्यक्ति को प्रद्युम्न की पूजा करनी होती है, जो ब्रह्मा की पूजा के माध्यम से प्राप्त होता है। इन मामलों को वैदिक साहित्य में समझाया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)