विश्वमात्मगतं व्यञ्जन्कूटस्थो जगदङ्कुर: ।
स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तम: ॥ २० ॥
अनुवाद
इस प्रकार, विविधता प्रकट करने के बाद, तेजस्वी महत् तत्त्व जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड समाये हुए हैं, जो सृष्टि का मूल है और जो प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होता, उस अंधकार को निगल जाता है जिसने प्रलय के समय तेज को ढँक लिया था।
Thus the brilliant Mahat Tattva, within which all the universes are contained, which is the origin of the whole visible world and which is not destroyed even at the time of Pralaya, by manifesting its diversity swallows the darkness, which had covered the brilliance at the time of Pralaya.
तात्पर्य
चूँकि परम भगवान सदा विद्यमान, सर्व-आनंदमय और ज्ञान से संपन्न हैं, उनकी विभिन्न ऊर्जाएँ भी निष्क्रिय अवस्था में सदा विद्यमान रहती हैं। इस प्रकार जब महत्तत्व का निर्माण हुआ, तो उसने भौतिक अहंकार को प्रकट किया और उस अंधकार को निगल लिया जो विघटन के समय ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को ढँकता था। इस विचार को आगे समझाया जा सकता है। रात में एक व्यक्ति निष्क्रिय रहता है, रात के अंधकार से ढका रहता है, लेकिन जब वह सुबह जागता है, तो रात का आवरण, या सोते समय की भूल, गायब हो जाता है। इसी तरह, जब विघटन की रात के बाद महत्तत्व प्रकट होता है, तो इस भौतिक दुनिया की विविधता को प्रदर्शित करने के लिए तेज प्रकाशित होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥