ज्ञानं नि:श्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम् ।
यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम् ॥ २ ॥
अनुवाद
आत्म-साक्षात्कार की चरमोत्कर्ष ज्ञान के माध्यम से ही संभव है। मैं तुम्हें वह ज्ञान प्रदान करूँगा जिससे भौतिक संसार से जुड़ाव की गाँठें कट जाती हैं।
The ultimate attainment of self-realization is knowledge. I will tell you the knowledge that cuts the knots of attachment to the material world.
तात्पर्य
कहा जाता है कि आत्म-साक्षात्कार या 'आत्म-ज्ञान' की उचित समझ से लोग भौतिक आसक्तियों से मुक्त हो जाते हैं। ज्ञान हमें जीवन की परम पूर्णता प्राप्त करते की ओर ले जाता है और हमें यह आभास कराता है कि हम कौन हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद (3.8) भी इसे प्रमाणित करता है। "तम एव विदित्वा अती मृत्युमेति" - बस अपने आध्यात्मिक स्थान को समझकर या यह देखकर कि हम कौन हैं, हम भौतिक बंधनों से मुक्त हो सकते हैं। वैदिक साहित्यों में हमें अपने-आपको देखने के कई तरीके बताए गए हैं और भागवतम (पुरुषस्य आत्म-दर्शनम्) ने भी इसे प्रमाणित किया है कि हमें खुद को देखना चाहिए और यह जानना चाहिए कि हम कौन हैं। जैसे कि कपील देव ने अपनी माता को समझाया, यह "दर्शन" उचित प्रामाणिक स्रोत से सुनकर किया जा सकता है। कपील देव सबसे बड़े अधिकारी हैं, क्योंकि वे भगवान के रूप हैं और अगर कोई बिना किसी व्याख्या के इसे ऐसे ही स्वीकार कर लेता है जैसा कि बताया गया है, तो उसे स्वयं का दर्शन हो सकता है। भगवान चैतन्य ने सनातन गोस्वामी को व्यक्ति की वास्तविक संवैधानिक स्थिति बताई थी। उन्होंने सीधे कहा था कि प्रत्येक व्यक्ति आत्मा कालजयी रूप से भगवान श्री कृष्ण का सेवक है। "जीवा 'स्वरूप' हया - कृष्णेर 'नित्य-दास'" - प्रत्येक अलग-अलग आत्मा सदा के लिए एक सेवक है। जब इंसान यह समझ लेता है कि वह परम आत्मा का एक हिस्सा है और उसका सनातन स्थान परम भगवान के साथ मिलकर उनकी सेवा करना है, तो इसे आत्म-साक्षात्कार कहा जाता है। इस प्रकार से खुद को समझने की यह स्थिति भौतिक आकर्षण के बंधन (हृदय-ग्रन्थि-भेदनम्) को खत्म कर देती है। झूठे अहंकार या शरीर और भौतिक दुनिया के साथ खुद को झूठे तरीके से जोड़ने के कारण, व्यक्ति माया में फंस जाता है लेकिन जैसे ही वह यह समझ लेता है कि वह गुणात्मक रूप से परम भगवान का एक ही तत्व है, क्योंकि वह एक ही श्रेणी यानी आध्यात्मिक आत्मा से संबंध रखता है और उसका निरंतर यही स्थान है कि वह सेवा करे। इस प्रकार, व्यक्ति आत्म-दर्शन और हृदय-ग्रन्थि-भेदनम्- आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त करता है। जो लोग भौतिक दुनिया के आसक्ति के बंधन को तोड़ सकते हैं, उनकी समझ को ज्ञान कहते हैं। आत्म-दर्शन का अर्थ है ज्ञान के माध्यम से खुद को देखना; इसलिए, जब व्यक्ति वास्तविक ज्ञान की खेती करके झूठे अहंकार से मुक्त हो जाता है, तो वह खुद को देखता है और यह मानवीय जीवन की परम आवश्यकता होती है। आत्मा इस प्रकार भौतिक प्रकृति की चौबीस श्रेणियों में फंसने से अलग हो जाती है। सांख्य नामक व्यवस्थित दार्शनिक प्रक्रिया की खोज को ज्ञान और आत्म-प्रकाश कहा जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥