चूंकि जीव भगवान का संवैधानिक रूप से हिस्सा है, इसलिए परमेश्वर जीवों को बहुत स्नेह करते हैं। दुर्भाग्य से, जब जीव भ्रमित हो जाता है या बाहरी ऊर्जा से मोहित हो जाता है, तो वह भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल जाता है, लेकिन जैसे ही वह अपनी संवैधानिक स्थिति से अवगत होता है, वह मुक्त हो जाता है। सशर्त आत्मा की सूक्ष्म स्वतंत्रता उसकी सीमांत स्थिति द्वारा प्रदर्शित की जाती है। अगर वह चाहे, तो वह भगवान को भूल सकता है और भौतिक प्रकृति पर अधिकार करने के लिए एक झूठे अहंकार के साथ भौतिक अस्तित्व में आ सकता है, लेकिन अगर वह चाहे तो वह अपना चेहरा भगवान की सेवा की ओर मोड़ सकता है। व्यक्तिगत जीवित इकाई को वह स्वतंत्रता दी जाती है। उसका सशर्त जीवन समाप्त हो जाता है और उसका जीवन सफल हो जाता है जैसे ही वह अपना मुंह भगवान की ओर मोड़ता है, लेकिन अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके वह भौतिक अस्तित्व में प्रवेश करता है। फिर भी भगवान इतने दयालु हैं कि, परमात्मा के रूप में, वह हमेशा सशर्त आत्मा के साथ रहते हैं। भगवान की चिंता न तो भौतिक शरीर का आनंद लेने की है और न ही भोगने की। वह जीव के साथ केवल स्वीकृति देने वाले और गवाह के रूप में रहते हैं ताकि जीव अपनी गतिविधियों के परिणाम प्राप्त कर सके, अच्छे या बुरे।
सशर्त आत्मा के शरीर के बाहर, परमेश्वर समय कारक के रूप में बने रहते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार, पच्चीस तत्व हैं। पहले से वर्णित चौबीस तत्व और समय कारक पच्चीस बनाते हैं। कुछ विद्वान दार्शनिकों के अनुसार, परमात्मा को कुल छब्बीस तत्वों को मिलाकर शामिल किया गया है।
