प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि ।
चेष्टा यत: स भगवान्काल इत्युपलक्षित: ॥ १७ ॥
अनुवाद
हे प्रिय माता, स्वायंभुव मनु की पुत्री और हे दैविक काल, मैंने पहले ही व्याख्या कर दी है कि काल ही सर्वोच्च विभूति है। काल से यथास्वरूप प्रकृति को आंदोलित करने पर सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
O Swayambhuva-daughter, O Mother, as I have told you, Kaal itself is the Supreme Lord, from whom creation begins with the movement of the indifferent (equanimity) and unmanifested nature.
तात्पर्य
अप्रकट भौतिक प्रकृति, प्रधान की व्याख्या की जा रही है। प्रभु कहते हैं कि जब सर्वोच्च भगवान के दृष्टि से अप्रकट भौतिक प्रकृति उत्साहित होती है, तो वह विभिन्न तरीकों से खुद को प्रकट करना शुरू कर देती है। इस उत्साह से पहले, यह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से बातचीत के बिना, तटस्थ अवस्था में रहती है। दूसरे शब्दों में, भौतिक प्रकृति सर्वोच्च भगवत व्यक्तित्व के संपर्क के बिना कोई विविध अभिव्यक्तियाँ उत्पन्न नहीं कर सकती है। इसे भगवद्गीता में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। सर्वोच्च भगवान भौतिक प्रकृति के उत्पादों का कारण है। उनके संपर्क के बिना, भौतिक प्रकृति कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकती है। चैतन्य-चरितामृत में भी, इस संबंध में एक बहुत ही उपयुक्त उदाहरण दिया गया है। यद्यपि बकरी की गर्दन पर निप्पल स्तन निप्पल प्रतीत होते हैं, लेकिन वे दूध नहीं देते हैं। इसी तरह, भौतिक प्रकृति भौतिक वैज्ञानिक को एक अद्भुत तरीके से कार्य करने और प्रतिक्रिया करने के लिए प्रकट होती है, लेकिन वास्तव में यह उत्तेजक, समय के बिना कार्य नहीं कर सकती है, जो सर्वोच्च भगवान का प्रतिनिधित्व है। जब समय भौतिक प्रकृति की तटस्थ अवस्था को उत्तेजित करता है, तो भौतिक प्रकृति विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों का उत्पादन करना शुरू कर देती है। अंततः यह कहा जाता है कि सर्वोच्च भगवत व्यक्तित्व सृष्टि का कारण है। जैसे एक महिला एक आदमी द्वारा गर्भवती हुए बिना बच्चे पैदा नहीं कर सकती है, वैसे ही भौतिक प्रकृति तब तक कुछ भी उत्पादन या प्रकट नहीं कर सकती जब तक कि उसे समय के रूप में सर्वोच्च भगवत व्यक्तित्व द्वारा गर्भवती नहीं किया जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥