श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.26.16 
प्रभावं पौरुषं प्राहु: कालमेके यतो भयम् ।
अहङ्कारविमूढस्य कर्तु: प्रकृतिमीयुष: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
भौतिक प्रकृति के संपर्क में आने वाली भ्रमित आत्मा के अहंकार के कारण मृत्यु का भय काल में होता है, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रभाव के कारण उत्पन्न होता है।
 
The influence of the Supreme Personality of Godhead is felt in time, because it creates the fear of death due to the ego of the deluded soul that comes into contact with material nature.
तात्पर्य
जीवात्मा का मृत्यु का भय शरीर से अपनी पहचान करने वाले उसके मिथ्या अहंकार के कारण होता है। हर कोई मृत्यु से डरता है। वास्तव में आत्मा के लिए कोई मृत्यु नहीं है, लेकिन शरीर की पहचान स्वंय के रूप में करने में अपने अवशोषण के कारण मृत्यु का भय उत्पन्न होता है। श्रीमद-भागवतम (11.2.37) में भी कहा गया है, भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात्। द्वितीया से तात्पर्य पदार्थ से है, जो आत्मा से परे है। आत्मा का गौण प्रकट पदार्थ है, क्योंकि पदार्थ आत्मा से उत्पन्न होता है। जिस प्रकार वर्णित भौतिक तत्व परमेश्वर या सर्वोच्च आत्मा के कारण होते हैं, उसी प्रकार शरीर भी आत्मा का एक उत्पाद है। इसलिए, भौतिक शरीर को द्वितीया या “द्वितीय” कहा जाता है। जो इस द्वितीय तत्व या आत्मा की द्वितीय प्रदर्शनी में लीन है, वह मृत्यु से डरता है। जब कोई पूरी तरह से आश्वस्त हो जाता है कि वह अपना शरीर नहीं है, तो मृत्यु के डर का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि आत्मा नहीं मरती।

यदि आत्मा भक्ति सेवा की आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न हो जाती है, तो वह जन्म और मृत्यु के मंच से पूरी तरह से मुक्त हो जाती है। उसकी अगली स्थिति भौतिक शरीर से पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता है। मृत्यु का भय काल या समय कारक की क्रिया है, जो भगवान की सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रभाव का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरे शब्दों में, समय विनाशकारी है। जो कुछ भी बनाया जाता है वह विनाश और विघटन के अधीन होता है, जो समय की क्रिया है। समय भगवान का प्रतिनिधित्व है, और यह हमें यह भी याद दिलाता है कि हमें भगवान के प्रति समर्पण करना चाहिए। भगवान प्रत्येक बद्ध आत्मा से समय के रूप में बात करते हैं। वह भगवद-गीता में कहते हैं कि अगर कोई उनके प्रति समर्पण करता है, तो जन्म और मृत्यु की कोई समस्या नहीं रह जाती। इसलिए हमें समय कारक को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार करना चाहिए जो हमारे सामने खड़ा है। इसे आगे निम्नलिखित श्लोक में समझाया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)