श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.26.15 
एतावानेव सङ्ख्यातो ब्रह्मण: सगुणस्य ह ।
सन्निवेशो मया प्रोक्तो य: काल: पञ्चविंशक: ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
इन सबको सुयोग्य ब्रह्म माना जाता है। इन्हें मिलाने वाला तत्व काल है, जिसे पच्चीसवें तत्व के रूप में गिना जाता है।
 
All of these are considered to be the appropriate Brahma. The element that unites all of these is time, which is counted as the twenty-fifth element.
तात्पर्य
वेदों के अनुसार ब्रह्म से परे कोई अस्तित्व नहीं है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य उपनिषद 3.14.1)। विष्णु पुराण में भी कहा गया है कि जो कुछ भी हम देखते हैं वह परस्य ब्रह्मण: शक्ति: है; सब कुछ परम पूर्ण सत्य, ब्रह्म की ऊर्जा का विस्तार है। जब ब्रह्म तीन गुणों सत्व, रज और तम के साथ मिल जाता है, तो उसके परिणामस्वरूप भौतिक विस्तार होता है, जिसे कभी-कभी सगुण ब्रह्म कहा जाता है और जिसमें ये पच्चीस तत्व होते हैं। निर्गुण ब्रह्म में, जहां कोई भौतिक दोष नहीं है, या आध्यात्मिक दुनिया में, तीनों मोड - सत्व, रज और तम - मौजूद नहीं हैं। जहाँ निर्गुण ब्रह्म पाया जाता है, वहाँ सरल अमिश्र सत्व प्रबल होता है। सांख्य दर्शन प्रणाली द्वारा सगुण ब्रह्म का वर्णन पच्चीस तत्वों से मिलकर किया गया है, जिसमें समय कारक (भूत, वर्तमान और भविष्य) भी शामिल है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)