श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.26.14 
मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मकम् ।
चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
आंतरिक, सूक्ष्म इंद्रियों को चार प्रकार का माना जाता है, मन, बुद्धि, अहंकार और दूषित चेतना। उनके कार्यों के आधार पर ही उनमें अंतर किया जा सकता है क्योंकि वे विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करती हैं।
 
The internal subtle senses are known to be of four types as mind, intellect, ego and impure consciousness. They can be distinguished according to their different functions because they indicate different symptoms.
तात्पर्य
यहाँ वर्णित चार आंतरिक इंद्रियाँ या सूक्ष्म इंद्रियाँ विभिन्न विशेषताओं द्वारा परिभाषित की जाती हैं। जब शुद्ध चेतना भौतिक दूषण से प्रदूषित होती है और जब शरीर के साथ पहचान प्रमुख हो जाती है, तो व्यक्ति को मिथ्या अहंकार के अधीन कहा जाता है। चेतना आत्मा का कार्य है, और इसलिए चेतना के पीछे आत्मा है। भौतिक संदूषण से प्रदूषित चेतना को अहंकार कहा जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)