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bhagavat 3.26.13: ज्ञान प्राप्ति हेतु इन्द्रियाँ एवं कर्म करने हेतु इन्द्रियाँ, इनकी संख्या दस होती है। ये हैं—श्रवण इन्द्रिय, स्वाद इन्द्रिय, स्पर्श इन्द्रिय, दृष्टि इन्द्रिय, घ्राण इन्द्रिय, वाग इन्द्रिय, कार्य करने की इन्द्रियाँ, चलने की इन्द्रियाँ, प्रजनन इन्द्रियाँ और मलत्याग इन्द्रियाँ।   |   bhagavat अध्याय 3.26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 26: प्रकृति के मूलभूत सिद्धान्त  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.26.13 
इन्द्रियाणि दश श्रोत्रं त्वग्दृग्रसननासिका: ।
वाक्‍करौ चरणौ मेढ्रं पायुर्दशम उच्यते ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
ज्ञान प्राप्ति हेतु इन्द्रियाँ एवं कर्म करने हेतु इन्द्रियाँ, इनकी संख्या दस होती है। ये हैं—श्रवण इन्द्रिय, स्वाद इन्द्रिय, स्पर्श इन्द्रिय, दृष्टि इन्द्रिय, घ्राण इन्द्रिय, वाग इन्द्रिय, कार्य करने की इन्द्रियाँ, चलने की इन्द्रियाँ, प्रजनन इन्द्रियाँ और मलत्याग इन्द्रियाँ।
 
Including the sense organs and the physical senses, their number is ten. These are the sense of hearing, sense of taste, sense of touch, sense of sight, sense of smell, sense of speech, sense of action, sense of movement, sense of genitalia and sense of excretion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)