यह मेरी श्रेष्ठता है कि मेरे भय से हवा चलती है, मेरे भय से सूरज चमकता है, और मेरे भय से मेघों के राजा इंद्र वर्षा करते हैं। मेरे भय से ही आग जलती है, और मेरे भय से ही मृत्यु जीवन का हरण करती है।
It is my greatness that the wind blows because of my fear, the sun shines because of my fear and Indra, the king of clouds, rains because of my fear. The fire burns because of my fear and death takes so many lives because of my fear.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण भगवद गीता में कहते हैं कि सभी कार्यों में कार्यरत प्राकृतिक नियम उनकी अधीक्षणता के कारण सही हैं। किसी को ये नहीं सोचना चाहिये कि प्रकृति खुद-ब-खुद कार्य कर रही है, बिना निगरानी के। वैदिक साहित्य कहता है कि बादल देवता इंद्र के नियंत्रण में हैं, सूर्य देवता द्वारा गर्मी का वितरण किया जाता है, चंद्रमा शांत चाँदनी का वितरण करता है और हवा देवता वायु की व्यवस्था के अधीन बह रही है। लेकिन इन सभी देवताओं से ऊपर, भगवान सर्वोच्च जीव हैं। नित्यो नित्यानां चेतनश चेतनानाम् (कठ उपनिषद 2.2.13)। देवता भी साधारण जीव हैं, लेकिन अपनी आस्था के कारण - उनकी भक्ति सेवा भाव - उन्हें ऐसे पदों पर पदोन्नत किया गया है। ये विभिन्न देवता, या निर्देशक, जैसे चंद्रमा, वरुण और वायु, अधिकारी-देवता कहलाते हैं। देवता विभागीय प्रमुख हैं। सर्वोच्च भगवान की सरकार में केवल एक या दो या तीन ग्रह नहीं हैं; लाखों ग्रह हैं और लाखों ब्रह्मांड हैं। भगवान का एक विशाल साम्राज्य है और उन्हें सहायकों की आवश्यकता है। देवता उनके शारीरिक अंग माने जाते हैं। ये वैदिक साहित्य के वर्णन हैं। इन परिस्थितियों में, सूर्य-देव, चंद्र-देव, अग्नि-देव और वायु-देव सर्वोच्च भगवान के निर्देशन में काम कर रहे हैं। भगवद गीता में इसकी पुष्टि की गई है, मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चराचरम। प्राकृतिक नियम उन्हीं की अधीक्षणता में आयोजित किए जा रहे हैं। चूँकि वे पृष्ठभूमि में हैं, इसलिए सब कुछ सटीक और नियमित रूप से किया जा रहा है। जिसने भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का सहारा लिया है, वह अन्य सभी प्रभावों से पूरी तरह से सुरक्षित है। वह अब किसी और की सेवा नहीं करता है या किसी और का एहसानमंद नहीं है। बेशक वह किसी की अवज्ञा नहीं करता है, लेकिन उसकी पूरी सोच भगवान की सेवा में लीन है। भगवान कपिल का यह कथन कि उनके निर्देशन में हवा चल रही है, आग जल रही है और सूर्य गर्मी दे रहा है, भावुक नहीं है। निजीकरणवादी कह सकता है कि भागवत भक्त भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में किसी को बनाते हैं और कल्पना करते हैं और उसे योग्यता प्रदान करते हैं, लेकिन वास्तव में यह न तो कल्पना है और न ही भगवान के नाम पर कृत्रिम शक्ति का आरोप है। वेदों में कहा गया है, भीषास्मद वाता पवते भीषोदेति सूर्यः: "सर्वोच्च भगवान के भय से वायु-देवता और सूर्य-देवता कार्य कर रहे हैं।" भीषास्मद अग्निश चंद्रश च मृत्युर् धावति पंचमः: "अग्नि, इंद्र और मृत्यु भी उनके निर्देशन में कार्य कर रहे हैं।" ये वेदों के कथन हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥