श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.25.36 
तैर्दर्शनीयावयवैरुदार-
विलासहासेक्षितवामसूक्तै: ।
हृतात्मनो हृतप्राणांश्च भक्ति-
रनिच्छतो मे गतिमण्वीं प्रयुङ्क्ते‍ ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के मनमोहक रूपों को मुस्कुराते और आकर्षक होते देखकर और उनके सुखदायक शब्दों को सुनकर, शुद्ध भक्त अपनी अन्य सभी चेतना खो देते हैं। उनकी इंद्रियाँ अन्य सभी कार्यों से मुक्त हो जाती हैं, और वह भक्ति में लीन हो जाते हैं। इस प्रकार वह बिना किसी प्रयास के ही मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
 
Seeing the smiling and attractive form of the Lord and hearing His very charming words, the pure devotee loses all his other consciousness. His senses become free from all other activities and get absorbed in devotion. In this way, he attains liberation unintentionally, even if unintentionally.
तात्पर्य
भक्तों के तीन वर्गीकरण हैं: प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी और तृतीय श्रेणी। तृतीय श्रेणी के भक्त भी मुक्त आत्माएँ हैं। इस श्लोक में यह समझाया गया है कि यद्यपि उनके पास ज्ञान नहीं है, लेकिन केवल मंदिर में देवता की सुंदर सजावट को देखते हुए, भक्त उनके विचार में लीन हो जाते हैं और अन्य सभी चेतना खो देते हैं। केवल कृष्ण चेतना में स्वयं को स्थापित करके, इंद्रियों को भगवान की सेवा में लगाकर, व्यक्ति अगोचर रूप से मुक्त हो जाता है। इसकी पुष्टि भगवद-गीता में भी की गई है। केवल शास्त्रों में बताई गई शुद्ध भक्ति सेवा का पालन करके, व्यक्ति ब्रह्म के समान हो जाता है। भगवद-गीता में कहा गया है, ब्रह्म-भूयाय कल्पते। इसका अर्थ है कि जीव अपनी मूल अवस्था में ब्रह्म है क्योंकि वह परम ब्रह्म का अभिन्न अंग है। परन्तु केवल भगवान के नित्य सेवक के रूप में अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाने के कारण, वह माया से अभिभूत है और माया उसे पकड़े हुए हैं। अपने वास्तविक संवैधानिक स्थिति को भूल जाना माया है। नहीं तो वह सनातन ब्रह्म है। जब किसी को अपनी स्थिति के प्रति सचेत होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, तो वह समझता है कि वह भगवान का सेवक है। "ब्रह्म" आत्म-साक्षात्कार की स्थिति को दर्शाता है। यहां तक कि तृतीय श्रेणी का भक्त- जो परम सत्य के ज्ञान में उन्नत नहीं है, परन्तु केवल महान भक्ति के साथ प्रणाम करता है, भगवान के बारे में सोचता है, मंदिर में भगवान को देखता है और देवता को अर्पित करने के लिए फूल और फल लाता है- वह अगोचर रूप से मुक्त हो जाता है। श्रद्धांवितः: महान भक्ति के साथ भक्त पूज्य सम्मान और सामग्री देवता को अर्पित करते हैं। राधा और कृष्ण, लक्ष्मी और नारायण, और राम और सीता के विग्रह भक्तों के लिए बहुत आकर्षक हैं, इतना अधिक कि जब वे मंदिर में मूर्ति को सजा हुआ देखते हैं तो वे भगवान के विचार में पूरी तरह से लीन हो जाते हैं। यही मुक्ति की स्थिति है। दूसरे शब्दों में, यहाँ इस बात की पुष्टि की गई है कि तृतीय श्रेणी का भक्त भी अलौकिक स्थिति में है, जो लोग विचार-विमर्श या अन्य तरीकों से मुक्ति की कोशिश कर रहे हैं। शुकदेव गोस्वामी और चार कुमार जैसे महान अवैयक्तिकवादी भी मंदिर में देवताओं की सुंदरता, सजावट और भगवान को अर्पित किए गए तुलसी की सुगंध से आकर्षित थे, और वे भक्त बन गए। यद्यपि वे मुक्त अवस्था में थे, लेकिन अवैयक्तिकवादी बने रहने के बजाय वे भगवान की सुंदरता से आकर्षित हुए और भक्त बन गए। यहाँ विलास शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। विलास भगवान की गतिविधियों या लीलाओं को दर्शाता है। मंदिर की पूजा में यह एक निर्धारित कर्तव्य है कि व्यक्ति को न केवल देवता को अच्छी तरह से सजा हुआ देखने के लिए मंदिर जाना चाहिए, बल्कि साथ ही उसे श्रीमद-भागवतम, भगवद-गीता या कुछ समान साहित्य का पाठ सुनना चाहिए, जिसे नियमित रूप से मंदिर में पढ़ा जाता है। वृंदावन में यह प्रणाली है कि प्रत्येक मंदिर में शास्त्रों का पाठ होता है। तृतीय श्रेणी के भक्त जिनके पास श्रीमद-भागवतम या भगवद-गीता को पढ़ने के लिए साहित्यिक ज्ञान या समय नहीं है, उन्हें भगवान की लीलाओं के बारे में सुनने का अवसर मिलता है। इस तरह उनके मन हमेशा भगवान के विचार-उनके रूप, उनकी गतिविधियों और उनके अलौकिक स्वभाव- में लीन रह सकते हैं। कृष्ण चेतना की यह स्थिति एक मुक्त अवस्था है। इसलिए भगवान चैतन्य ने भक्ति सेवा के निर्वहन में पाँच महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं की अनुशंसा की: (1) भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण करना, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, (2) भक्तों के साथ जुड़ना और उन्हें यथासंभव सेवा करना, (3) श्रीमद-भागवतम सुनना, (4) सजे हुए मंदिर और देवता को देखना और यदि संभव हो, (5) वृंदावन या मथुरा जैसी जगह पर रहना। ये पाँच बातें ही भक्त को सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करने में मदद कर सकती हैं। इसकी पुष्टि भगवद-गीता और यहाँ श्रीमद-भागवतम में की गई है। यह बात सभी वैदिक साहित्यों में स्वीकार की जाती है कि तृतीय श्रेणी के भक्त भी अगोचर रूप से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)