श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 25: भक्तियोग की महिमा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.25.30 
तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीर्हरे ।
सुखं बुद्ध्येय दुर्बोधं योषा भवदनुग्रहात् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय पुत्र कपिल, आखिरकार मैं एक नारी हूँ। मेरे लिए परम सत्य को समझना अत्यंत कठिन है, क्योंकि मेरी बुद्धि बहुत अधिक विकसित नहीं है। लेकिन यदि आप कृपा करके मुझे समझाएँगे, तो मैं इसे समझने और उसके द्वारा दिव्य सुख का अनुभव कर पाऊँगी, भले ही मैं बहुत अधिक बुद्धिमान न होऊँ।
 
My son Kapil, after all I am a woman. It is very difficult for me to understand the ultimate truth because my intellect is not that sharp. Although I am not that intelligent. But still, if you kindly explain it to me then I will be able to understand it and experience divine happiness.
तात्पर्य
परम सत्य का ज्ञान साधारण, अल्पज्ञ पुरुषों के लिए बहुत सरलता से समझने योग्य नहीं होता; परन्तु यदि गुरुशिष्य के प्रति पर्याप्त दयालु हैं, भले ही शिष्य कितना भी मूर्ख क्यों न हो, तब गुरु के दिव्य अनुग्रह से सब कुछ प्रकट हो जाता है। इसलिए विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं, यस्य प्रसादाद, गुरु की दयालुता से, परम पुरुष भगवान् की दया, भगवत्-प्रसादः, प्रकट होती है। देवहूति ने अपने महान् पुत्र से प्रार्थना की कि उन पर दया करें क्योंकि वह एक अल्पज्ञ महिला थीं और उनकी माता भी थीं। कपिलदेव की कृपा से परम सत्य को समझना उनके लिए सम्भव था, भले ही वह विषय साधारण व्यक्तियों, विशेष रूप से स्त्रियों के लिए बहुत कठिन हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)