मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् ।
मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवा: ॥ २२ ॥
अनुवाद
ऐसा साधु दृढ़ निश्चयी भाव से प्रभु की पूरी तरह भक्ति करता है। प्रभु की खातिर वह दुनिया के सभी रिश्तों जैसे पारिवारिक सम्बंध और मैत्री संबंधों का त्याग कर देता है।
Such a sadhu does staunch devotion to God with unwavering devotion. For God, he abandons all other worldly relationships such as family relationships and friendships.
तात्पर्य
त्याग के जीवन क्रम में स्थित व्यक्ति, एक संन्यासी, उसे साधु भी कहते हैं क्योंकि उसने अपने सभी त्याग दिए हैं - अपना घर, अपनी आरामदायकता, अपने दोस्त, अपने रिश्तेदार और दोस्तों और परिवार के लिए अपने कर्तव्य। सर्वोच्च भगवान के लिए उसने अपने सभी त्याग दिए हैं। एक संन्यासी सामान्यतः जीवन के त्यागी क्रम में होता है, पर उसका त्याग तब ही सफल होगा जब उसकी ऊर्जा महान तपस्या के साथ प्रभु की सेवा में लग जाएगी। इसीलिए यहाँ कहा गया है, भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम्। जो व्यक्ति गंभीरता से प्रभु की सेवा में संलग्न होकर रहता है और जीवन के त्यागी क्रम में है, वह साधु है। साधु वह है जिसने समाज, परिवार और सांसारिक मानवतावाद के लिए अपनी सभी जिम्मेदारियों सिर्फ प्रभु की सेवा के लिए छोड़ दी है। जैसे ही वह दुनिया में जन्म लेता है, एक व्यक्ति के पास कई जिम्मेदारियाँ और दायित्व होते हैं - जनता के लिए, देवताओं के लिए, महान ऋषियों के लिए, सामान्य जीवों के लिए, अपने माता-पिता के लिए, परिवार के पूर्वजों के लिए और कई अन्य के लिए। जब सर्वोच्च प्रभु की सेवा के लिए वह ऐसे सभी दायित्व छोड़ देता है, तो उसे ऐसे दायित्व त्याग के लिए दंडित नहीं किया जाता है। पर यदि इंद्रिय तुष्टि के लिए कोई व्यक्ति ऐसे सभी दायित्व छोड़ देता है, तो उसे प्रकृति के कानून के अनुसार दंडित किया जाता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥