श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  3.24.31 
तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव ।
यानि यानि च रोचन्ते स्वजनानामरूपिण: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे राया, यद्यपि आपका कोई भौतिक रूप नहीं है, पर आपके अपने ही असंख्य रूप हैं। वे सभी सही मायने में आपके ही आध्यात्मिक रूप हैं, जो आपके भक्तों को सुखानुभूति कराते हैं।
 
O Lord, although You have no physical form, You have infinite forms of Your own. They are truly Your transcendental forms and bring joy to Your devotees.
तात्पर्य
ब्रह्म संहिता में कहा गया है कि भगवान ही एक सत्य है, लेकिन उनके अनंत अथवा अतुलनीय रूप हैं। अद्वैंतम अच्युतम अनादिम अनंत रूपम। भगवान का मूल रूप है, फिर भी उनके अनेक रूप हैं। वे अनेक रूप उनके द्वारा अपने भक्तों की रुचि के अनुसार दिव्य रूप से प्रकट किए गए हैं। यह समझा जाता है कि एक बार भगवान रामचन्द्र के महान भक्त हनुमान ने कहा था कि वह जानते थे कि लक्ष्मी के पति नारायण और सीता के पति राम एक ही हैं और लक्ष्मी और सीता में कोई अंतर नहीं है, लेकिन उनके लिए, उन्हें भगवान राम का रूप पसंद था। इसी तरह, कुछ भक्त कृष्ण के मूल रूप की पूजा करते हैं। जब हम "कृष्ण" कहते हैं तो हम भगवान के सभी रूपों का उल्लेख करते हैं - न केवल कृष्ण, बल्कि राम, नृसिंह, वराह, नारायण, आदि। दिव्य रूपों की विविधताएँ एक साथ विद्यमान हैं। ब्रह्म संहिता में भी ऐसा ही कहा गया है: रामदि मूर्तिषु… नानवतारम। वह पहले से ही अनेक रूपों में विद्यमान है, लेकिन कोई भी रूप भौतिक नहीं है। श्रीधर स्वामी ने टिप्पणी की है कि अरूपिणः, "बिना रूप के," का अर्थ भौतिक रूप के बिना है। भगवान के पास रूप है, अन्यथा यह कैसे कहा जा सकता है, तान्य एव ते अभिरूपाणि रूपाणि भगवम्स तव: "आपके आपके रूप हैं, लेकिन वे भौतिक नहीं हैं। भौतिक रूप से आपका कोई रूप नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से, दिव्य रूप से, आपके अनेक रूप हैं"? मायावादी दार्शनिक भगवान के इन दिव्य रूपों को समझ नहीं सकते हैं, और निराश होकर, वे कहते हैं कि सर्वोच्च भगवान अव्यक्ति है। लेकिन यह सच नहीं है; जब भी कोई रूप होता है तो एक व्यक्ति होता है। कई वैदिक साहित्यों में भगवान को पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है "मूल रूप, मूल भोगी।" निष्कर्ष यह है कि भगवान का कोई भौतिक रूप नहीं है, और फिर भी, विभिन्न श्रेणियों के भक्तों की पसंद के अनुसार, वह एक साथ अनेक रूपों में विद्यमान हैं, जैसे राम, नृसिंह, वराह, नारायण और मुकुंद। ऐसे हज़ारों-हज़ारों रूप हैं, पर वे सभी विष्णु-तत्त्व, कृष्ण हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)