श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.24.27 
अहो पापच्यमानानां निरये स्वैरमङ्गलै: ।
कालेन भूयसा नूनं प्रसीदन्तीह देवता: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
कर्दम मुनि ने कहा- हे! इस ब्रह्माण्ड के देवता बहुत समय के बाद उन आत्माओं पर प्रसन्न हुए हैं जो अपने दुष्कर्मों के कारण भौतिक जगत में उलझकर कष्ट पा रही हैं।
 
Kardama Muni said—Oh! The Gods of this universe have become pleased after a long period on the suffering souls who are in material bondage due to their misdeeds.
तात्पर्य
यह भौतिक संसार दुःख भोगने का स्थान है, जो यहाँ निवास करने वालों, अर्थात बद्ध आत्माओं के स्वयं के कुकर्मों के कारण है। दुःख उन्हें बाहरी स्रोत से थोपा नहीं जाता, बल्कि बद्ध आत्माएँ अपने कृत्यों से अपना स्वयं का दुःख स्वयं पैदा करती हैं। जंगल में, आग स्वतः घटित हो जाती है। ऐसा नहीं है कि किसी को वहाँ जाकर आग लगानी पड़ती है; विभिन्न पेड़ों के बीच घर्षण के कारण, आग स्वतः ही लग जाती है। जब इस भौतिक संसार की जंगल की आग से बहुत अधिक तपिश होती है, तो ब्रह्मा सहित देवता, परेशान होकर, भगवान विष्णु, भगवान के परम पुरुषत्व, के पास पहुँचते हैं और उनसे स्थिति को सुधारने की प्रार्थना करते हैं। तब भगवान के परम पुरुषत्व अवतरित होते हैं। दूसरे शब्दों में, जब बद्ध आत्माओं के दुखों से देवता व्यथित हो जाते हैं, तो वे भगवान के पास दुख का उपचार करने पहुँचते हैं, और भगवान के परम पुरुषत्व अवतरित होते हैं। जब भगवान अवतरित होते हैं, तो सभी देवता प्रफुल्लित हो उठते हैं। इसलिए कार्दम मुनि ने कहा, "बहुत-बहुत वर्षों के मानवीय दुख के बाद, अब सभी देवता संतुष्ट हैं क्योंकि भगवान के अवतार कर्पिलादेव प्रकट हो चुके हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)