इसलिए, आज तुम अपनी बेटियों को उनके स्वभाव और रुचियों के अनुसार श्रेष्ठ मुनियों को प्रदान कर दो और इस तरह पूरे ब्रह्मांड में अपनी प्रशंसा फैलाओ।
Therefore, today you give these daughters to the best sages according to their nature and interests and in this way spread your fame in the entire universe.
तात्पर्य
नौ मुख्य ऋषि मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और अथर्व हैं। ये सभी ऋषि सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं और ब्रह्मा चाहते थे कि कार्दम मुनि की पहले से जन्मीं नौ पुत्रियाँ उन्हें सौंप दी जाएँ। यहाँ दो शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं - यथा-शीलम् और यथा-रुचि। पुत्रियों को यथाशील और यथारुचि के अनुसार ही संबंधित ऋषियों को सौंपा जाना चाहिए। यही स्त्री और पुरुष को मिलाने की कला है। स्त्री और पुरुष को केवल काम भावनाओं के विचार से नहीं जोड़ना चाहिए। कई अन्य विचार भी होते हैं, खासतौर पर स्वभाव और रुचि। यदि स्त्री और पुरुष के रुचि और स्वभाव में अंतर होता है तो उनका मिलन दुखदायी होगा। करीब चालीस साल पहले तक भारत में विवाहों में स्त्री और पुरुष की रुचियों और स्वभावों का मिलान पहले कर लिया जाता था और उसके बाद ही उनका विवाह होता था। यह कार्य संबंधित माता-पिता के निर्देशन में सम्पन्न किया जाता था। माता-पिता स्त्री और पुरुष के स्वभाव और रुचियों का ज्योतिषीय निर्धारण करते थे और जब उनका मिलान होता था तो तभी उन्हें विवाह के लिए चुना जाता था: "यह स्त्री और पुरुष एक दूसरे के लिए उपयुक्त हैं, उनका विवाह होना चाहिए।" अन्य बातों का कम महत्व होता था। यही व्यवस्था ब्रह्मा ने सृष्टि के आरंभ में देने की सलाह दी थी: "तुम्हारी पुत्रियों का विवाह स्वभाव और रुचि के अनुसार ऋषियों के साथ होना चाहिए।" ज्योतिष गणना के अनुसार किसी मनुष्य को देव प्रकृति और आसुरी प्रकृति में से किसी के साथ वर्गीकृत किया जाता है। इसी प्रकार पत्नी या पति का चयन किया जाता था। देव प्रकृति वाली स्त्री का विवाह देव प्रकृति वाले पुरुष से ही होना चाहिए। आसुरी प्रकृति वाली स्त्री का विवाह आसुरी प्रकृति वाले पुरुष से ही होना चाहिए। तभी वे खुश रह सकेंगे। लेकिन अगर स्त्री आसुरी प्रकृति की है और पुरुष देव प्रकृति का है तो उनका मिलन असुमेल भरा होगा; वे ऐसे विवाह में खुश नहीं रह सकते। आजकल स्त्री और पुरुषों का विवाह उनके स्वभाव और रुचि के अनुसार नहीं होता, इसलिए अधिकांश विवाह दुखदायी होते हैं और अलगाव हो जाता है। भागवतम् के बारहवें स्कंध में भविष्यवाणी की गई है कि कलियुग में वैवाहिक जीवन को सिर्फ काम भावना के आधार पर स्वीकारा जाएगा; जब स्त्री और पुरुष काम में संतुष्ट होंगे तो वे विवाह करेंगे और जब काम में कमी होगी तो वे अलग हो जाएँगे। यह असली विवाह नहीं है बल्कि वैसे ही स्त्री और पुरुष का मिलन है जैसे कुत्ते और बिल्लियों का होता है। इसलिए आधुनिक युग में जन्म लेने वाले बच्चे सही मायने में इंसान नहीं होते। इंसान का जन्म दो बार होना चाहिए। बच्चे का जन्म सबसे पहले अच्छे पिता और माता के यहाँ होता है और फिर उसका जन्म आध्यात्मिक गुरु और वेदों से होता है। पहला बाप और माँ उसे जन्म देते हैं और दूसरा बाप और माँ आध्यात्मिक गुरु और वेद बनते हैं। बच्चों को जन्म देने वाले वैदिक विवाह प्रणाली के अनुसार हर पुरुष और स्त्री आध्यात्मिक ज्ञान से प्रबुद्ध था और बच्चा पैदा करने के लिए उनके मिलन के समय सबकुछ बारीकी से और वैज्ञानिक तरीके से किया जाता था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥