यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात कही गई है। सत्त्वेनमांशेन: जब सर्वोच्च व्यक्ति भगवान आते हैं, तो वे अपने साथ वैकुण्ठ की सभी निधि लाते हैं; इसलिए उनका नाम, उनका रूप, उनके गुण, उनकी निधि और उनकी परिचारिका सभी पारलौकिक दुनिया के हैं। वास्तविक भलाई पारलौकिक दुनिया में है। यहाँ भौतिक दुनिया में, अच्छाई का गुण शुद्ध नहीं है। भलाई मौजूद हो सकती है पर कुछ रज और तम के रंग भी होंगे। आध्यात्मिक दुनिया में अच्छाई का अपरिमिश्र गुण प्रबल होता है; वहाँ अच्छाई के गुण को शुद्ध-सत्व, शुद्ध अच्छाई कहा जाता है। शुद्ध-सत्व का एक और नाम वासुदेव है क्योंकि भगवान का जन्म वासुदेव से हुआ है। एक और अर्थ है कि जब कोई विशुद्ध रूप से अच्छाई के गुणों में स्थित होता है, तो वे सर्वोच्च व्यक्ति भगवान के रूप, नाम, गुण, निधि और परिचारिका को समझ सकते हैं। अंसना शब्द से यह भी पता चलता है कि सर्वोच्च भगवान, कृष्ण, अपने कुछ अंशों के अंश के रूप में कपिलदेव के रूप में प्रकट हुए। भगवान कला के रूप में या अंश के रूप में विस्तार करते हैं। अंस का अर्थ है “सीधा विस्तार”, और कला का अर्थ है “विस्तार का विस्तार”। विस्तार, विस्तार के विस्तार और सीधे सर्वोच्च भगवान में कोई अंतर नहीं है, जैसे एक मोमबत्ती और दूसरी में कोई अंतर नहीं होता - लेकिन फिर भी वह मोमबत्ती जिससे अन्य जलाई जाती हैं, मूल कहलाती हैं। इसलिए कृष्ण को परब्रह्म, या परम भगवान और सभी कारणों का कारण कहा जाता है।
