श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.23.57 
साहं भगवतो नूनं वञ्चिता मायया द‍ृढम् ।
यत्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात् ॥ ५७ ॥
 
 
अनुवाद
हे स्वामी, निस्संदेह मुझे भगवान श्रीकृष्ण की अति अद्भुत माया ने पूर्ण रूप से ठग लिया है, क्योंकि भौतिक बंधनों से मुक्ति प्रदान करने वाली आपके सानिध्य में रहते हुए भी मैंने मुक्ति की इच्छा नहीं की।
 
हे स्वामी, निस्संदेह मुझे भगवान श्रीकृष्ण की अति अद्भुत माया ने पूर्ण रूप से ठग लिया है, क्योंकि भौतिक बंधनों से मुक्ति प्रदान करने वाली आपके सानिध्य में रहते हुए भी मैंने मुक्ति की इच्छा नहीं की।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत तेईसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas