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श्लोक 3.23.55  |
सङ्गो य: संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया ।
स एव साधुषु कृतो नि:सङ्गत्वाय कल्पते ॥ ५५ ॥ |
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| अनुवाद |
| इन्द्रियतृप्ति के लिए संगति निश्चित रूप से बंधनों से भरा हुआ रास्ता है। लेकिन जब यही संगति किसी साधु पुरुष के साथ की जाती है तो यह मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है, भले ही वह अनजाने में ही की गई हो। |
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| इन्द्रियतृप्ति के लिए संगति निश्चित रूप से बंधनों से भरा हुआ रास्ता है। लेकिन जब यही संगति किसी साधु पुरुष के साथ की जाती है तो यह मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है, भले ही वह अनजाने में ही की गई हो। |
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