श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.23.50 
लिखन्त्यधोमुखी भूमिं पदा नखमणिश्रिया ।
उवाच ललितां वाचं निरुध्याश्रुकलां शनै: ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
वह अपने पैर, जो रत्नों समान चमकते नाखूनों से सुशोभित थे, से जमीन पर चिह्न बना रही थी। उसका सिर झुका हुआ था और वह अपने आँसुओं को रोककर धीरे-धीरे मनमोहक लहजे में बोल रही थी।
 
वह अपने पैर, जो रत्नों समान चमकते नाखूनों से सुशोभित थे, से जमीन पर चिह्न बना रही थी। उसका सिर झुका हुआ था और वह अपने आँसुओं को रोककर धीरे-धीरे मनमोहक लहजे में बोल रही थी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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