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श्लोक 3.23.45  |
तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता ।
न चाबुध्यत तं कालं पत्यापीच्येन सङ्गता ॥ ४५ ॥ |
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| अनुवाद |
| उस विमान में देवहूति अपने सुंदर पति के साथ मनोहारी और इच्छा जगाने वाली शय्या पर ऐसे मग्न रही कि उसे समय का पता ही नहीं चला। |
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| उस विमान में देवहूति अपने सुंदर पति के साथ मनोहारी और इच्छा जगाने वाली शय्या पर ऐसे मग्न रही कि उसे समय का पता ही नहीं चला। |
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