|
| |
| |
श्लोक 3.23.42  |
किं दुरापादनं तेषां पुंसामुद्दामचेतसाम् ।
यैराश्रितस्तीर्थपदश्चरणो व्यसनात्यय: ॥ ४२ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| भगवान् के चरण-कमलों की शरण में आए हुए दृढ़ निश्चयी जनों के लिए क्या दुर्लभ है? उनके चरण तो गंगा जैसी पवित्र नदियों के उद्गम हैं, जिससे सांसारिक जीवन के सारे दुःख दूर हो जाते हैं। |
| |
| भगवान् के चरण-कमलों की शरण में आए हुए दृढ़ निश्चयी जनों के लिए क्या दुर्लभ है? उनके चरण तो गंगा जैसी पवित्र नदियों के उद्गम हैं, जिससे सांसारिक जीवन के सारे दुःख दूर हो जाते हैं। |
| ✨ ai-generated |
| |
|