श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.23.41 
भ्राजिष्णुना विमानेन कामगेन महीयसा ।
वैमानिकानत्यशेत चरँल्लोकान् यथानिल: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
वह विभिन्न लोकों से होते हुए इस तरह से यात्रा करता रहा जैसे वायु बिना रोक-टोक के चारों दिशाओं में बहती रहती है। उसी महान और चमकीले हवाई-महल में बैठकर जो उसकी इच्छा के अनुसार उड़ सकता था, वह देवताओं से भी आगे निकल गया।
 
वह विभिन्न लोकों से होते हुए इस तरह से यात्रा करता रहा जैसे वायु बिना रोक-टोक के चारों दिशाओं में बहती रहती है। उसी महान और चमकीले हवाई-महल में बैठकर जो उसकी इच्छा के अनुसार उड़ सकता था, वह देवताओं से भी आगे निकल गया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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