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श्लोक 3.23.33  |
सुदता सुभ्रुवा श्लक्ष्णस्निग्धापाङ्गेन चक्षुषा ।
पद्मकोशस्पृधा नीलैरलकैश्च लसन्मुखम् ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| उसके मुखमण्डल की शोभा सुंदर दांतों और आकर्षक भौहों से बढ़ रही थी। आकर्षक गीली कोरों से जगमगाते उसके नेत्र कमल की कलियों की शोभा को भी मात दे रहे थे। उसका चेहरा काले घुंघराले बालों से घिरा हुआ था। |
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| उसके मुखमण्डल की शोभा सुंदर दांतों और आकर्षक भौहों से बढ़ रही थी। आकर्षक गीली कोरों से जगमगाते उसके नेत्र कमल की कलियों की शोभा को भी मात दे रहे थे। उसका चेहरा काले घुंघराले बालों से घिरा हुआ था। |
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