श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.23.30 
अथादर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् ।
विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
तब उसने शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखा। उसका शरीर समस्त प्रकार के मल से रहित हो गया था और वह माला से सज्जित की गई थी। निर्मल वस्त्र पहने और शुभ तिलक से विभूषित होने के कारण दासी उसकी अत्यन्त आदरपूर्वक सेवा कर रही थीं।
 
तब उसने शीशे में अपना प्रतिबिम्ब देखा। उसका शरीर समस्त प्रकार के मल से रहित हो गया था और वह माला से सज्जित की गई थी। निर्मल वस्त्र पहने और शुभ तिलक से विभूषित होने के कारण दासी उसकी अत्यन्त आदरपूर्वक सेवा कर रही थीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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