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श्लोक 3.23.19  |
चक्षुष्मत्पद्मरागाग्र्यैर्वज्रभित्तिषु निर्मितै: ।
जुष्टं विचित्रवैतानैर्महार्हैर्हेमतोरणै: ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| हीरों की दीवारों में जड़े हुए मनभावन माणिकों से ऐसा प्रतीत होता था मानो उसमें नेत्र हों। विचित्र चँदोवों और अत्यधिक कीमती सोने के तोरणों से सजा हुआ था वह मंदिर। |
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| हीरों की दीवारों में जड़े हुए मनभावन माणिकों से ऐसा प्रतीत होता था मानो उसमें नेत्र हों। विचित्र चँदोवों और अत्यधिक कीमती सोने के तोरणों से सजा हुआ था वह मंदिर। |
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