श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.23.17 
तत्र तत्र विनिक्षिप्तनानाशिल्पोपशोभितम् ।
महामरकतस्थल्या जुष्टं विद्रुमवेदिभि: ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
दीवारों में जगह-जगह की कलात्मक संरचनाओं से उसकी सुंदरता बढ़ गई थी। उसका फर्श पन्ना मणि का था और चौकियाँ मूंगे की बनी हुई थीं।
 
दीवारों में जगह-जगह की कलात्मक संरचनाओं से उसकी सुंदरता बढ़ गई थी। उसका फर्श पन्ना मणि का था और चौकियाँ मूंगे की बनी हुई थीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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