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श्लोक 3.23.17  |
तत्र तत्र विनिक्षिप्तनानाशिल्पोपशोभितम् ।
महामरकतस्थल्या जुष्टं विद्रुमवेदिभि: ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| दीवारों में जगह-जगह की कलात्मक संरचनाओं से उसकी सुंदरता बढ़ गई थी। उसका फर्श पन्ना मणि का था और चौकियाँ मूंगे की बनी हुई थीं। |
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| दीवारों में जगह-जगह की कलात्मक संरचनाओं से उसकी सुंदरता बढ़ गई थी। उसका फर्श पन्ना मणि का था और चौकियाँ मूंगे की बनी हुई थीं। |
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