श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.23.12 
मैत्रेय उवाच
प्रियाया: प्रियमन्विच्छन् कर्दमो योगमास्थित: ।
विमानं कामगं क्षत्तस्तर्ह्येवाविरचीकरत् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय ने कहा- हे विदुर, अपनी प्यारी पत्नी की इच्छा को पूरा करने के लिए, ऋषि कर्दम ने अपनी योग शक्ति का प्रयोग किया और तुरंत एक हवाई महल बनाया जो उनकी इच्छानुसार यात्रा कर सकता था।
 
Maitreya further said—O Vidura, to fulfill the desire of his beloved, the sage Kardama used his yogic powers and instantly created an aerial palace (vimana) which could travel as per his wish.
तात्पर्य
यहाँ योगम ास्थितः शब्द सार्थक हैं। ऋषि कर्दम पूर्णरूपेण योग में स्थित थे। वास्तविक योगाभ्यास के फलस्वरूप आठ प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं- योगी चाहे तो छोटे से छोटे से भी छोटा हो सकता है, चाहे तो बड़े से बड़े से भी बड़ा हो सकता है, चाहे तो हल्के से हल्के से भी हल्का हो सकता है, अपनी इच्छानुसार कुछ भी प्राप्त कर सकता है, चाहे तो ग्रह तक का सृजन कर सकता है, चाहे तो किसी पर भी अपना प्रभाव स्थापित कर सकता है, इत्यादि। इस प्रकार योगसिद्धि प्राप्त करके उसके बाद साधक आध्यात्मिक जीवन की सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इसलिए कर्दम ऋषि के लिए अपनी इच्छानुसार स्वर्ग में अपनी प्रेमिका पत्नी की इच्छा की पूर्ति के लिए एक महल का निर्माण करना कोई बड़ी विलक्षण बात न थी। उन्होंने तुरंत ही एक राजमहल बना दिया जिसका वर्णन निम्नलिखित छंदों में है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)