| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 3: यथास्थिति » अध्याय 23: देवहूति का शोक » श्लोक 11 |
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| | | | श्लोक 3.23.11  | तत्रेतिकृत्यमुपशिक्ष यथोपदेशं
येनैष मे कर्शितोऽतिरिरंसयात्मा ।
सिद्ध्येत ते कृतमनोभवधर्षिताया
दीनस्तदीश भवनं सदृशं विचक्ष्व ॥ ११ ॥ | | | | | | अनुवाद | | देवहूति ने कहा- हे प्रभु, मैं काम-वासना से बहुत पीडि़त हूँ। इसलिए आप शास्त्रों के अनुसार इसका समाधान करें। मेरा दुबला शरीर, जो काम-वासना की तृप्ति न होने से क्षीण होता जा रहा है, आपके योग्य बन जाए। इसके लिए आप किसी उपयुक्त घर के बारे में भी सोचें। | | | | देवहूति ने कहा- हे प्रभु, मैं काम-वासना से बहुत पीडि़त हूँ। इसलिए आप शास्त्रों के अनुसार इसका समाधान करें। मेरा दुबला शरीर, जो काम-वासना की तृप्ति न होने से क्षीण होता जा रहा है, आपके योग्य बन जाए। इसके लिए आप किसी उपयुक्त घर के बारे में भी सोचें। | | ✨ ai-generated | | |
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